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सब कुछ है अब यार सियासी- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२/२२/२२/२२


जनता पर हर वार सियासी
नेता  की  है  हार  सियासी।१।
*
खून खराबा झेल रहा नित
होकर यह सन्सार सियासी।२।
*
बाहर बाहर फूट का दिखना
भीतर जुड़ना  तार सियासी।३।
*
बस्ती में  आने  मत देना
कोई भी अंगार सियासी।४।
*
घर  फूटेगा  हो  जाने  दो
बातें बस दो चार सियासी।५।
*
देश का पहिया जाम पड़ा है
दौड़ रही  बस कार  सियासी।६।
*
संकट का क्या अन्त करेगा
झूठा हर  अवतार  सियासी।७।
*
दम घोटे है नित जनता का
उठी  हुई  दीवार  सियासी।८।
*
जन सेवक जो कहते खुद को
जनता  पर  हैं  भार  सियासी।९।
*
यूँ तो भाई हम सब लेकिन
लड़ने का आधार सियासी।१०।
*
रोग सियासी है जन्नत का
दो उसको उपचार सियासी।११।
*
रिश्ता नाता  प्यार  को छोड़ो
सब कुछ है अब यार सियासी।१२।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

* यदि स्नेहीजनों को लगे कि क्रम परिवर्न से प्रवाह बढ़ेगा तो अवश्य सुझाएं । सादर...

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 7, 2021 at 10:29am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" जी।लाजवाब गज़ल।

देश का पहिया जाम पड़ा है
दौड़ रही  बस कार  सियासी।६।

संकट का क्या अन्त करेगा
झूठा हर  अवतार  सियासी।७।

Comment by Rachna Bhatia on January 6, 2021 at 7:16pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। आदरणीय,

'घर बिखरे पर हो जाने दो'

मुझे बेहतर लग रहा है।

सादर

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