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शम्स हरदम छुपा नहीं रहता......( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112

शम्स हरदम छुपा नहीं रहता
बादलों से ढका नही रहता (1)

लोग मुझको न ढूँढ पाएँगे
मैं कहाँ हूँ पता नहीं रहता  (2)

इश्क़ में काम इतने होते हैं
फिर कोई काम का नहीं रहता  (3)

लोग आपस में बाँट लेते हैं
मेरा हिस्सा बचा नहीं रहता (4)

हम सभी मिल के एक होते तो
मुल्क इतना बँटा नहीं रहता (5)

लौट आया है सुख मिरे घर में
देख रहता है या नहीं रहता (6)

इक न इक दिन तो ज़ख़्म भरता है
उम्रभर तो हरा नहीं रहता (7)

सिर्फ रहती है दैर में मूरत
अब वहाँ देवता नहीं रहता (8)

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2021 at 7:12pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by सालिक गणवीर on March 8, 2021 at 6:21pm

 मुहतरम  अमीरुद्दीन 'अमीर साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी शिर्कत ,क़ीमती इस्लाह और हौसला अफ़जाई के मश्कूर -ओ - ममनून हूँ

Comment by सालिक गणवीर on March 8, 2021 at 6:20pm

उस्ताद -ए - मुहतरम Samar kabeer साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी शिर्कत ,क़ीमती इस्लाह और हौसला अफ़जाई के मश्कूर -ओ - ममनून हूँ

Comment by Samar kabeer on March 7, 2021 at 3:00pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on March 7, 2021 at 10:31am

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। मतले में ऊला को सानी और सानी को ऊला करने से बात पुर-असर होगी। आख़िरी शे'र के ऊला में 'रहती' को 'रक्खी' करना बहतर होगा। सादर। 

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