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नज़्म: ख़्वाहिश

कोई ख़्वाब न होता आँखों में 

कोई हूक न उठती सीने में

कितनी आसानी होती 

या रब तन्हा जीने में

दिल जब से टूटा चाहत में

रिंद बने पैमानों के

ढलते ढलते ढल गई

सारी उम्र गुजर गई पीने में

यूँ ही सांसें लेते रहना

यूँ ही जीते रहना बस

हर दिन साल के जैसा 'गुजरा

हर इक साल महीने में

दुनिया डूबी लहरों में

हम डूबे यार सफ़ीने में

देखीं कैसी कैसी बातें

अज़ब ग़ज़ब दुनियादारी

वो कितने ना पाक रहे 

जो भीगे रहे पसीने में

प ज़र्रा ज़र्रा पाक हो गया काशी और मदीने में

हर इक ख़्वाहिश रही अधूरी हर इक ख़्वाहिश जीने में

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम

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Comment

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Comment by Aazi Tamaam on April 25, 2021 at 9:05am

सादर प्रणाम आदरणीय धामी सर

हौसला अफजाई व प्रतिक्रिया के लिये सहृदय आभार

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 18, 2021 at 7:41am

आ. भाई आज़ी तमाम जी, नज्म का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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