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गीतिका छंद: रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

14-12

रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

खुशनुमा इंसान दहशत, के निशाने हो गये

बेबसी का हाल देखा, दिल दहल कर रह गया

मुफ़्लिसी में ज़िंदगी का, ख़्वाब जल कर रह गया

डर से कोरोना के भी, वो भला अब क्या डरे

नित्य जो रोटी कि खातिर, मौत से सौदा करे

इंसानों के बीच भाव, घृणा का पैदा किया

धर्म के इन रक्षकों ने, देश का सौदा किया

पर ये धर्मांध किसी का, साथ याँ देते नहीं

इंसानियत को धर्म से, ऊपर ये रखते नहीं

आज मंज़र है भयावह, मौत बन फ़ैली बबा

कोई तो हो मोजिज़ा कि, अब यहाँ भेजे दवा

ज़िंदगी उन जंगलों में, मस्त भी थी टास्क भी

पेड़ के पत्ते कि जीवन, दान भी थे मास्क भी

अब तो संगमरमरी सी, हो गई दुनिया पूरी

फ़ासिले भी हुए मुकम्मल, हो गई दो गज दूरी

सत्ता के लोभी सुने न, बेबस चीख पुकार को

बैठ के लाशों के उपर, चला रहे सरकार को

गैस का चूल्हा दिया पर, घर कि खुशियाँ छीन लीं

दाम बड़ा सिलेंडरों के, सब नेकियाँ छीन लीं

कोई है बेरोजगार, तो कोई लाचार है

पर मुनाफे में अंबानी, का यहाँ व्यापार है

ठगते कहकर जनता को, माता जी बेटा जी

नित नये बदलें किरदार, मन मौजी नेता जी

बहरूपिया कोई माल, लूट रहा जनता का

धीरे धीरे सब्र बांध, टूट रहा जनता का

नफरतों का नशा फूँके, हैं दिन भर ये चर्सी

जाग गई गर जनता तो, खो बैठेंगे कुर्सी

मौलिक व अप्रकाशित

आज़ी तमाम

Views: 145

Comment

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Comment by Aazi Tamaam on April 26, 2021 at 9:53pm

सादर प्रणाम आदरणीय धामी सर
हौसला अफ़ज़ाई व सराहना के लिये सहृदय शुक्रिया
ये मेरी पहली छंद रचना है
सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 3:18pm

आ. भाई आजी तमाम जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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