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ग़ज़ल - 'आरज़ू' टूटी न उम्मीद से रिश्ता टूटा

वज़्न -2122 1122 1122 22/112

क्यों इसे आब दिया सोच के दरिया टूटा
जब समुंदर के किनारे कोई तिश्ना टूटा

एक साबित क़दम इंसान यूँ तन्हा टूटा
देख कर उसको न टूटे कोई ऐसा टूटा

वस्ल की जिस पे मुकद्दर ने लिखी थी तहरीर
वक़्त की शाख़ से वो क़ीमती लम्हा टूटा

तेरे बिन ज़ीस्त मेरी तुझ-सी ही मुश्किल गुज़री
हिज्र में मुझ पे भी तो ग़म का हिमाला टूटा

कुछ न टूटा मेरे हालात की आँधी में बस
जिसमें तुम थे वही ख़्वाबों का घरोंदा टूटा

कितने दिल टूटे यहाँ इश्क़ में पड़ कर लेकिन
इस ज़माने से महब्बत का न जज़्बा टूटा

वो न आएँगे ये मालूम हमें है फिर भी
'आरज़ू' टूटी न उम्मीद से रिश्ता टूटा

-©अंजुमन 'आरज़ू' 
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 8, 2021 at 10:39am

आ. अन्जुमन जी, अभिवादन । अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बवाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on November 6, 2021 at 10:31pm

मुहतरमा अंजुमन आरज़ू साहिबा आदाब अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ।  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2021 at 6:14pm

आ. आरज़ू जी,

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है.. बधाई स्वीकार करें 

Comment by Samar kabeer on November 5, 2021 at 8:15pm

मुहतरमा अंजुमन 'आरज़ू' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

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