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ज़िंदगी की तलाश

ना खबर है राह की ना मजिंल का ठिकाना है

खुद की तलाश में हम खुद को भुलाए जा रहे है

नज़्म है कोई ना कोई गुंज़ाइश-ए तराना है

अंजान अल्फ़ाज़ को खुदका बताए जा रहे है

फलक के अक्स में हम तैरते हुए

उस पार हो भी जाए तो हासिल क्या है

ैशाखियों को पतवार बनाकर

किश्ती को हम चलाए जा रहे है

हमने अक्सर दूसरे के निगाह में

खुदको देखने की कोशिश की

अपने घर का वो आईना मगर

हम आज भी यु हीं भुलाए जा रहे है

 

पास इतने था मेरे की छूटता ही नहीं

हाथ अपना हम छुड़ाए भी तो कैसे

ूर इतना हुआ हमसे सुन नही पाता

खुदको उसके नाम से बुलाए जा रहे है

हर छोड़ पर लगा ये मंज़िल है

पास आते ही नया मोड़ हो गया

चल के थक चुके दौड़ के हांफ चुके

हम रेंगते हुए अब भी कदम बढ़ाए जा रहे है

जितने भी भागे इसके पीछे

गवाकर अपना सब कुछ यहाँ

संत, फ़क़ीर, पोप सभी क़तार में पास पास है

अपनी पारी का इंतज़ार किये जा रहे है

स्वर्ग, जन्नत, हेवेन, हर जुबान में, नाम कई है इसके यहां  

राह सबकी है जुदा सभी से, पर सब उसी पर चले जा रहे है

कई वजह है जो की हमे, ज़िंदा रख सकती है अब भी

उनके ही एवज़ में हम, मौतका सामान लिए जा रहे है

 

हर घूंट से ज़िन्दगी अगर, घट भी जाए तो परवाह क्या

हम ज़िन्दगी का जाम सब पर, यूँ ही लुटाए जा रहे है

उम्र बीत गयी बिखरे पन्नो, को एक साथ समेटते हुए

हम रोज़ बस नई उलझन में, उलझते जा रहे है

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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