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रोला छंद :-

धड़की बन कर याद , सुहानी  वो  बरसातें  ।
दो अधरों की पास, सुलगती दिल की बातें ।
अनबोली  वो  बात, प्यार का बना फसाना ।
धड़के दिल के पास, मिलन का वही तराना ।
-----------------------------------------------------
दिन भर करते पाप, शाम को फेरें  माला ।
उपदेशों  के  संत, साँझ को  पीते  हाला  ।
पाखंडी  संसार , यहाँ  सब   झूठे  मेले   ।
ढोंगी करता मौज , सज्जन दु:ख ही झेले ।

सुशील सरना / 31-3-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 18, 2022 at 1:48pm

आदरणीय सुशील सरनाजी, 

आपके दो रोले छंद और दोनों भाव के स्तर नितांत प्रच्छन्न !

वैसे दूसरा छंद किसी अतिरेक को ही शाब्दिक कर रहा है. इस तरह के सामान्यीकरण से हमें बचना चाहिए.  

 

एक बात : 

अनबोली  वो  बात, प्यार का बना फसाना .... प्यार की बनी अफसाना .. क्यों कि बात स्त्रीलिंग है. मतलब कि, अनबोली बात ही न प्यार का अफसाना बनी है. 

सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 11, 2022 at 6:55pm

सुंदर रचना आदरणीय सुशील जी...लेकिन "दो अधरों की पास या दो अधरों के पास"

हार्दिक बधाई

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2022 at 12:32pm
आदरणीय मयंक जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Mayank Kumar Dwivedi on April 3, 2022 at 9:14am

सुंदर सृजन आदरणीय

Comment by Sushil Sarna on April 1, 2022 at 1:13pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन के भावों को मान देने एवं मार्गदर्शन करने के लिए दिल से आभार । सहमत एवं संशोधित ।इस हेतु
आपका दिल से आभार आदरणीय ।
Comment by Samar kabeer on April 1, 2022 at 7:16am

जनाब सुशील सरना जी आदाब, रोला छंदों का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें I 

'आ गई फिर याद --10 मात्रा -दूसरी बात 'ब्र्स्सतें' शब्द बहुवचन है इसलिए 'गई' की जगह "गईं" होना चाहिए' देखियेगा I 

' के   लगते   झूठे  मेले '--14 मात्रा -देखियेगा 

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