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मैं थक गया हूँ

थक गया हूँ झूठ खुद से और ना कह पाऊंगा

पत्थरों सा हो गया हूँ शैल ना बन पाऊंगा

 

देखते है सब यहाँ मुझे अजनबी अंदाज़ से

पास से गुजरते है तो लगते है नाराज़ से

 

बेसबर सा हो रहा हूँ जिस्म के लिबास में

बंद बैठा हूँ मैं कब से अक्स के लिहाफ में

 

काटता है खालीपन अब मन कही लगता नहीं

वक़्त इतना है पड़ा के वक़्त ही मिलता नहीं

 

रात भर मैं सोचता हूँ कल मुझे करना है क्या

है नहीं कुछ हाथ मेरे सोच कर डरना है क्या

 

टोक ना दे कोई मुझको मेरी इस बेकारी में

कुछ नहीं है दोष मेरा मेरी इस लाचारी में

 

चाह “आम” बनने की है “खास” बनना है नहीं

राह रोके दूसरों का वो कंकड़ बनना नहीं

 

आज-कल हर घडी मेरे सब्र का इंतहान है

टूट सकती है कभी भी इस डोर में ना जान है

 

खौफ का साया यहाँ है हर तरफ फैला हुआ

ज़ुर्रतों का खान था जो छोटा सा थैला हुआ

  

खो गया जो ये समय तो लौट कर ना आएगा

ढल गयी जो ये जवानी उम्र भर पछताएगा

 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 22, 2022 at 8:13pm

अच्छे भाव हैं भाई लेकिन ऊपर से दूसरी पंक्ति में पत्थर और शैल में अंतर होता है क्या?

कृपया ध्यान दे...

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