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पहचाना सा एक चेहरा

वर्षों हुए

एक बार देखे उसको

तब वो पूरे श्रृंगार में होती थी

बात बहुत

करती थी अपनी गहरी आँखों से

शब्द कहने से उसे उलझने तमाम होती थी

इमली चटनी

आम की क्यारी

चटपट खाना बहुत पसंद था

सैर सपाटे

चकमक कपडे रंगों का खेल

गाना बजाना हरदम था

खेलना, कूदना

पढ़ना, लिखना, सपने सजाना

सब उसके फेहरिस्त का हिस्सा थे

सावन, झूले

नहरों में नहाना, पसंद का खाना

कई तरह के किस्से थे

आज दिखी थी

नुक्कड़ के बाजार में अकेली

सादा सा लिबास ओढे हुए

चाल धीमी थी

कंधे पर कटे बाल झूलते

चेहरा बिल्कुल ही उदास था

काले पड़े थे

होंठ उनमें लाली न थी

कई दिनों से जैसे वो नहाई न थी

मैं ढूंढ रह था

उसकी गहरी आँखों को

वो सुख चुकी थी, उसमे अब नमी ना थी

मैंने लोगों से पूछा

ये यहां कब से खड़ी है

वो बोले जबसे उसके पतिका शव उठाया गया

लगा एक बार

बुलाऊँ लेकर मैं नाम उसका

मुझे नाम याद था पर मुझसे बुलाया ना गया

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 28, 2022 at 1:37pm
वाह मार्मिक अभिव्यक्ति आदरणीय जी ।

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