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दिल से अपने हमें गिला है ये

2122   1212    22

खुद ब खुद हो गया जुदा है ये

दिल हमारा तो मनचला है ये

गुम है दिल ये किसी पहेली में

और कई दिन से सिलसिला है ये

ज़िन्दगी का कोई सबूत नहीं

बस धड़कता सा हादसा है ये

बात करता नहीं कुछिक दिन से

" दिल से अपने हमें गिला है ये "

है समन्दर भी ये हरा अब तो

चांद पूनम तो ज़लज़ला है ये 

बदहवासी रही है हावी दिल

भागता बेहिसी मरा है ये

आखिरी दांव चल चुका 'चेतन'

 हद से बाहर है दिल दग़ा है ये

मौलिक व अप्रकाशित

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on October 13, 2022 at 7:50pm

आदरणीय चेतन जी, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। पिछले तरही मुशायरे में आपसे जो बातें आदरणीय समर कबीर सर ने कही थीं, कृपया उनका गम्भीरता से पालन करें। अच्छी ग़ज़लें कहने के लिए अच्छी ग़ज़लें पढ़ना बेहद ज़रूरी है। ढेरों शुभकामनाएँ। सादर।

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