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सभी कुछ जनता हूँ मैं

मोहब्बत है या नफरत है सभी कुछ जनता हूँ मैं 

इन लहजों को अदाओं को बहुत पहचानता हूँ मैं 

तेरे आने से फैली है जो खुशबू इन हवाओं में 

इस खुशबू से उस आहट तक तुझे पहचानता हूँ मैं 

कभी कुछ सोचना चाहा ख़यालों में तुम्ही ही आए 

कभी जो जागना चाहा ख्वाबों में तुम्ही आए 

गजब सी चाह है जागी मेरे दिल के ठिकाने पर 

घर जब लौटना चाहा तुम रस्ते में नज़र आए 

आँसू है उदासी है इन आँखों में पानी है 

तेरे हीं नाम अब लिखनी हमारी ज़िंदगानी है 

फर्क पड़ता है अब कैसा जो तू साथ भी ना हो 

मगर तेरी ही इन राहों में उम्र हमको बितानी है 

 

जो भी है जैसी भी है यही अपनी कहानी है 

मैं चलता ही जाउंगा जब तक ये जवानी है 

बुढापे मे सांस लेना भी जब अपने वश मे ना होगा 

मरेंगे साथ लेकर अपने तेरी जो भी निशानी है 

यही है हासिल अपना यही अपना ठिकाना है 

तेरे नाम से ही अब तो हमें रटता ज़माना है 

हमे याद भी नही हमारा नाम जो भी था 

कभी मैं तेरा दिवाना था अब तु मेरी दिवानी है

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 17, 2023 at 2:03pm

आ. अमन जी
थोडा शिल्प और छंद पर काम करेंगे तो रचनाकर्म सार्थक होगा 
सादर 

कृपया ध्यान दे...

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