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मोरा साजन छूटो जाय

सखी री मैं जाऊँ न पीहरवा..

पपीहा करत है पी हू पी हू
मोहे जोबन विरह हो जाय
सखी री मै जाऊँ न पीहरवा...!

कोयल बोलै कुूहू कुहू बागन में
मोरा सावन सूखौ जाय
सखी री मै जाऊँ न पीहरवा...!

नाचत मोर बदरिया बरसत है
मोरा आँगन बिसरौ जाय
सखी री मैं जाऊँ न पीहरवा..!

मरौ ददुरवा बूँद  पी  रह जाय
लो सोवत रहत साल भर वो तो
मो पै बिन पिया रह्यो न जाय

सखी री मैं जाऊँ न पीहरवा...!

कि पड़त हिंडोला वृन्दावन है
कान्हा राधा रह्यौ झुलाय

सखी री मैं न जाऊँ पीहरवा...!

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 21, 2023 at 5:18am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। सुंदर कजरी हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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