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आत्मविस्मरण

 

विद्युत सी तरंग ,

कम्पन का भूकंप ,

स्पर्श नहीं आग !

मन से तन तक जाग !

सांसों में उच्छ्वास,

एक एहसास ...

 

होश नहीं,

जान बही !

कम्पित होठों की प्यास,

एक एहसास ...

 

हाथों में नर्म बारूद,

बारूद मुख  में,

विस्फोट नस नस में !

बढ़ी प्यास,

एक एहसास ...

 

रिक्तता उभय ओर,     

पूर्णता पे जोर,

साँसों का वेग,

तीव्र संवेग,

मृत्यु सा वरन ,

जन्मों का मिलन ,

बुझी प्यास !

आत्मविस्मरण.

~ डा अजय कुमार शर्मा

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 29, 2011 at 10:19am

//

रिक्तता उभय ओर,     

पूर्णता पे जोर,///

आदरणीय डॉ अजय कुमार जी, गहरे भावों को आच्छादित एक बहुत ही खुबसूरत और प्रवाहयुक्त रचना को सृजित किया है, बधाई स्वीकार करें |


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 28, 2011 at 4:56pm

डॉ. अजय जी, बहुत ही सारगर्भित कविता कही है, आत्मविस्मरण की अवस्था को को मरहला दर मरहला बड़ी खूबी से शब्दों में ढाला है आपने. किसी नसरी नज़्म में भी अगर कवि ग़ज़ल की सी रवानगी पैदा करने में सफल रहता है तो उसकी लेखनी नमन करना बनता है, अत: दिल से साधुवाद प्रेषित कर रहा हूँ, स्वीकार करें.

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