For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मौसम हुआ सुहावना ,उपवन उपवन नूर
ग्लोबल वार्मिंग का असर अब गर्मी है दूर |


समझो प्यारे ध्यान से मौसमी यह बिसात
सुबह होती धूप अगर शाम हुई बरसात |


पारा बढ़ता जा रहा लेकिन बढ़ी न प्यास
फागुन के अब मास में श्रावण का अहसास |


फागुन बीता ओढ़ के रजाई और शाल
वोटर का पारा बढ़ा देख सियासी चाल |


मौसम का बदलाव ये कर ना दे बेहाल
सेहत के खजाने को रखना सब संभाल |

.....................................................

...........मौलिक व अप्रकाशित...............

Views: 633

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2014 at 2:49am

आदरणीया, आपको दोहे कहते एक अरसा हो गया है. आपका प्रयास अच्छा भी लगता है. लेकिन मेरा यह भी कहना है कि दोहा छंद पर प्रस्तुत हुआ आलेख काश आपने पढ़ लिया होता. अन्यथा, निम्नखित शब्द-संयोजन अपने-अपने चरणों में न होते -
मौसमी यह बिसात -- सम चरण में
रजाई और शाल - सम चरण में
सेहत के खजाने को - विषम चरण में

बहरहाल, इस प्रस्तुति पर आपको मेरी हार्दिक बधाइयाँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2014 at 6:29pm

आदरणीय सरिता जी , बहुत सुन्दर दोहे रचे हैं आपने , आपको दिली बधाइयाँ ॥ पमिय्पं के विषय मे आ. गणेश भाई , आदरणीया कल्पना जी ने जो सलाह दी है उसपे ज़रूर ध्यान दीजियेगा ॥

Comment by Sarita Bhatia on March 26, 2014 at 10:25am

आदरणीया दी बहुत खूब मुझे भी इसमें ज्यादा बाधा लग रही थी उन दोहों की बजाय 

Comment by Sarita Bhatia on March 26, 2014 at 10:24am

आदरणीय आशुतोष जी हार्दिक आभार 

Comment by कल्पना रामानी on March 25, 2014 at 10:13pm

सरिता जी सब दोहे अच्छे लगे, बहुत बहुत बधाई। गलतियों की ओर आ॰ गणेश जी इशारा कर दिया है, मुझे इस दोहे में भी लय कुछ बाधित लग रही है।

समझो प्यारे ध्यान से मौसमी यह बिसात
सुबह होती धूप अगर शाम हुई बरसात |

इसे इस तरह कहें तो ....

समझो प्यारे ध्यान से, यह मौसमी बिसात
धूप अगर होती सुबह, शाम हुई बरसात |

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2014 at 5:37pm

आदरणीया सरिता जी ..सभी दोहे मन को छू लेने वाले हैं ..मेरी तरफ से तहे दिल बधाई सादर 

Comment by Sarita Bhatia on March 25, 2014 at 10:06am

आदरणीय बागी जी हार्दिक आभार आपके अमूल्य मार्गदर्शन के लिए 

इन्हें इस तरह सुधारा जा सकता है कृपया मार्गदर्शन करें 

फागुन बीता ओढ़ के रजाई संग शाल /फागुन बीता पहन के गर्म वस्त्र औ शाल 
वोटर का पारा चढ़ा देख सियासी चाल |

मौसम का बदलाव ये कर ना दे बेहाल 
खजाना सब सेहत का रखो जरा संभाल |

Comment by Sarita Bhatia on March 25, 2014 at 9:57am

आदरणीय शिज्जू जी हार्दिक आभार मार्गदर्शन के लिए 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 24, 2014 at 10:14pm

सभी दोहे अच्छे लगें, इन दो दोहो पर ध्यान चाहूँगा, जहाँ प्रवाह बाधित है,

फागुन बीता ओढ़ के रजाई और शाल
वोटर का पारा बढ़ा देख सियासी चाल |

मौसम का बदलाव ये कर ना दे बेहाल
सेहत के खजाने को रखना सब संभाल |

बधाई प्रेषित है इस प्रस्तुति पर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 24, 2014 at 9:24pm

आदरणीया सरिता जी मौसम का बहुत बढ़िया चित्रण आपने किया है बहुत बहुत बधाई।
शिल्प की बात कहूँ तो कहीं कहीं प्रवाह बाधित है ज़रा ग़ौर फरमा लें।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

anwar suhail updated their profile
6 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२****सदा बँट के जग में जमातों में हम रहे खून  लिखते  किताबों में हम।१। * हमें मौत …See More
yesterday
ajay sharma shared a profile on Facebook
Thursday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"शुक्रिया आदरणीय।"
Monday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, पोस्ट पर आने एवं अपने विचारों से मार्ग दर्शन के लिए हार्दिक आभार।"
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार। पति-पत्नी संबंधों में यकायक तनाव आने और कोर्ट-कचहरी तक जाकर‌ वापस सकारात्मक…"
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदाब। सोशल मीडियाई मित्रता के चलन के एक पहलू को उजागर करती सांकेतिक तंजदार रचना हेतु हार्दिक बधाई…"
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार।‌ रचना पटल पर अपना अमूल्य समय देकर रचना के संदेश पर समीक्षात्मक टिप्पणी और…"
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर समय देकर रचना के मर्म पर समीक्षात्मक टिप्पणी और प्रोत्साहन हेतु हार्दिक…"
Sunday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, आपकी लघु कथा हम भारतीयों की विदेश में रहने वालों के प्रति जो…"
Sunday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय मनन कुमार जी, आपने इतनी संक्षेप में बात को प्रसतुत कर सारी कहानी बता दी। इसे कहते हे बात…"
Sunday
AMAN SINHA and रौशन जसवाल विक्षिप्‍त are now friends
Sunday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service