For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - धरती दीपक से जगमगानी है - पूनम शुक्ला

2122 2212 22
फिर अमावस की रात आनी है
हमने भी पर लड़ने की ठानी है


है अँधेरा औ चाँद खोया फिर
ये तो पहचानी इक कहानी है


रात आएगी जग छुपा लेगी
धरती दीपक से जगमगानी है


ऐ खुदा तुमने तो सजा दी थी
प्रेम की ये भी इक निशानी है


गम के भीतर ही सुख छुपा होगा
बात ये भी तो जानी मानी है


बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है


चल अमावस को फिर बना पूनम
ये तो आदत तेरी पुरानी है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित
पूनम शुक्ला

Views: 298

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by MAHIMA SHREE on October 19, 2014 at 7:20pm

अच्छी प्रस्तुती हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on October 17, 2014 at 10:19am

" बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । "

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 17, 2014 at 9:32am

बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है......बहुत खूब. इस शेर पर विशेष बधाई आपको , आदरणीया पूनम जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 16, 2014 at 6:59pm

बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है


चल अमावस को फिर बना पूनम
ये तो आदत तेरी पुरानी है ========= अच्छी गजल  i

Comment by Pawan Kumar on October 16, 2014 at 4:39pm

सुन्दर गजल के लिए सादर बधाई!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"जनाब दण्डपाणि 'नाहक़' जी आदाब, तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।"
4 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"कृपया नाम से पहले आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें ।"
8 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
""गीत तूने ग़म का ही  हमको सुनाया उम्रभर  ज़िन्दगी तुझको हसीं नग़्मा समझ बैठे थे…"
9 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"दुष्यंत मुस्तनद शाइर नहीं है,ऐसी बेशुमार ग़लतियाँ उसके कलाम में पाई जाती हैं,और नए साहित्यकार उसी को…"
17 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"अजय गुप्ता जी बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने बहुत बहुत बधाई "
26 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने और इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया, फिर "लफ़्ज़ को दो बार मैने जानकर एक…"
28 minutes ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"जी समर साहब, बहुत बेहतर। सर, एक शेर बता रहा हूँ जिसे पढ़ कर मैंने शम्अ का वज़न 22 सही समझ लिया। ये…"
35 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"नाहक जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
36 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"रवी भसीन जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
37 minutes ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"एक रस्मी बात को वादा समझ बैठे थे हम क्या कहा था उसने यारो क्या समझ बैठे थे हम अपनी मंज़िल का उसे…"
45 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"अजय गुप्ता जी ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत शुक्रिया "
46 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"राजेश कुमारी जी ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत शुक्रिया, फिर का दो बार प्रयोग जानकर किया था एक शिकायत का…"
46 minutes ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service