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कवि
----------------

आत्मावलोकन
-----------------

सभागार
खचा खच था भरा
कुछ सहमा सा
कुछ डरा डरा
खड़ा मैं किनारे धरे मौन
उसने
पूछा परिचय
मैं हूँ कौन ?

सकपकाया थर्राया
फिर तोडा मौन

तुम कौन ?
कभी अपने को जाना
नही समझोगे
व्यर्थ समझाना


मैं कवि हूँ अदना सा
नही हूँ डॉन


हकीकत
---------


भीतर घुसा
ढाढ़स कुछ पाया
अंधियारे में कुछ
समझ न आवा
मानव जीवन
बड़ा अनमोल
बेचारा कवि
बिकता बे मोल
दिग्गज कवि
भये मंचासीन
मौसमी कवि
सदा धरानसीन
शास्त्र , बंद ,
छन्द के बड़े प्रणेता
सगरे चम्मच
बस एक ही नेता
काव्य पाठ शुरू हुआ
था चेला जों गुरु हुआ
छंद बंद की बात तजी
बिन दूल्हा बारात सजी
कविता पढ़ी अतुकांत
बने बैठे कविता कान्त
देख हुआ बड़ा अचम्भा
नोचें सर या नोचें खम्भा

परिणति
----------

कवि हृदय चोटिल हुआ
देख कुटिल व्यवहार
बाँध पोटरिया राग की
छोड़ चला दरबार

इच्छा
-------
द्वार द्वार दुत्कार मिले
पड़े न गले में हार
ईश्वर तुमसे प्रार्थना
कवि जीवन मिले बारम्बार
मौलिक / अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

Views: 434

Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 10:06am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 

सादर अभिवादन

आपका स्नेह प्राप्त हुआ 

सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 16, 2015 at 5:59am

आदरणीय प्रदीप भाई , कवि मन को खूब टटोला है आपने ,कविता के लिये आपको बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 15, 2015 at 9:38pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी

सादर अभिवादन

आपने हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया है , तहे दिल से शुक्रिया .  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 15, 2015 at 10:22am

काव्य पाठ शुरू हुआ 
था चेला जों गुरु हुआ 
छंद बंद की बात तजी
बिन दूल्हा बारात सजी 
कविता पढ़ी अतुकांत 
बने बैठे कविता कान्त 
देख हुआ बड़ा अचम्भा 
नोचें सर या नोचें खम्भा-----बहुत खूब बहुत खूब्ब आदरणीय क्या सार्थक  कटाक्ष  किया है यही  तो  हो भी रहा है 

एक कवि के व्यथित मन को क्या शब्दबद्ध किया है ...अतिसुन्दर प्रस्तुति ..दिल से बधाई लीजिये आ० प्रदीप कुमार सिंह जी 

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