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चाय पिला पिला कर ,
लोगो की सेवा वो करता रहा,
महज़ चार चाय की कीमत पर ,
मालिक उसको छलता रहा,
भूखी अंतड़िया ,
क्या जाने चाय की तलब ,
दो रोटियां, चोखे संग,
पाने को पेट जलता रहा ,
बैठे चायखाने मे
खादी पहने
कुछ उच्च शिक्षित लोगों के मध्य
"बाल मजदूरी ठीक नहीं",
यही मुद्दा चलता रहा ,
कैसे रोके , कैसे टोके ,
सरकार अपनी है निकम्मी,
बातो बातो में
राजनीतिक विवादों में
घंटो निकलता रहा,
फिर चाय की तलब लगी,
तो छोटू की पुकार हुई,
एक बार फिर कड़क चाय पिलाना,
चाय पिला कर सारा दिन छोटू,                                                                                             (चित्र गुगल से साभार)
जूठे बर्तन घिसता रहा,

(मैं बहुत बहुत आभारी हू भाई श्री राणा प्रताप जी का जिनके सहयोग से मैं यह कविता लिख सका हू|)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2015 at 5:02pm
बुद्धिजीवियों पर करारा प्रहार करते हुए उत्कृष्ट शाब्दिक चित्रण चलचित्र की तरह पाठक को बाँधकर नवचिंतन को प्रेरित करता है। हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय Er. Ganesh Jee "Bagi" जी।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 26, 2010 at 9:56pm
आदरणीय त्रिपाठी सर, आपकी टिप्पणी ने इस कविता को पुरस्कृत कर दिया है, मैं अभिभूत हूँ आप जैसे फनकार के स्नेह को पाकर, सच कहूँ तो मेरी लेखनी और मेरे विचार दोनों धन्य हो गये |
Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on October 26, 2010 at 9:42pm
गणेश जी, आपकी कविता एक असरदार प्रहार है समाज के उन तथाकथित छद्म बुद्धिजीवियों के गाल पर जिनका नपुंसक चिंतन उन्हें सत्य के दर्शन करने ही नहीं देता...वो जिसके विषय में बात करते हैं उनकी आँखों के सामने उसी विषय का बलात्कार होता रहता है ...इस सत्य को भलीभांति उजागर कतरी है आपकी कविता...सच कहूँ तो जिस विषय को मैंने छोटू में चित्रित किया है वह तो मात्र एक सतही दृश्य है किन्तु आपने तो समस्या के मूल पर ज़ोरदार प्रहार किया है ..आपकी लेखनी और विचारों को मेरा प्रणाम

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 26, 2010 at 6:38pm
अनिल कुमार सिन्हा जी कहते है "kavita bahut hi samik hai.bal mazdoori ek samasya hai per arthik mazboori ke karan bachho ko yah kam karna padta hai.
is samasya ka samadhan dhoodna hoga."
Comment by Shaileshwar Pandey ''Shanti'' on October 22, 2010 at 3:00pm
Wah...Ganesh Ji, Ati sundar lika hai aapne. Padhate samay mere aankho se aansu lika gaye..."खादी पहने
कुछ उच्च शिक्षित लोगों के मध्य
"बाल मजदूरी ठीक नहीं",
यही मुद्दा चलता रहा ,
कैसे रोके , कैसे टोके ,
सरकार अपनी है निकम्मी,
बातो बातो में
राजनीतिक विवादों में
घंटो निकलता रहा,
फिर चाय की तलब लगी,
तो छोटू की पुकार हुई,
एक बार फिर कड़क चाय पिलाना,
चाय पिला कर सारा दिन छोटू,
जूठे बर्तन घिसता रहा,"

Bhai Ji, inhi logo ka to den hai ki bal Majaduri par aankush nahi laga ja sakata...kash BAL MAJADURI PAR PURN RUP SE ROK LAGAYA JA SAKATA.....Dhanyawad...
Comment by आशीष यादव on July 18, 2010 at 2:21pm
भूखी अंतड़िया ,
क्या जाने चाय की तलब ,
दो रोटियां, चोखे संग,
पाने को पेट जलता रहा

फिर चाय की तलब लगी,
तो छोटू की पुकार हुई,
एक बार फिर कड़क चाय पिलाना,
चाय पिला कर सारा दिन छोटू,
जूठे बर्तन घिसता रहा,

बहुत बढ़िया लाईने है ये, किस तरह से लोग मुद्दे की बात भूल जाते है और फिर से उसी छोटू को आवाज़ लगते है.
बहुत खूब. अत्यंत मार्मिक.
Comment by Narendra Vyas on July 11, 2010 at 5:09pm
वाह वाह ! बहुत ही प्रभावशाली और सामाजिक सरोकारों पर मानवीय संवेदनशून्यता पर तीखा प्रहार करती हुई एक सफल और यथार्थवादी कविता ..साधुवाद !!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 7, 2010 at 11:40am
Anil Bhaiya bahut bahut dhanyavad tippani deney key liyey, aap bilkul durust farmaa rahey hai, main aapkey rai sey itfaaq rakhta huu,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2010 at 11:33pm
Bahut bahut Dhanyavad Bhai Vikash jee, Bhai Satendra jee, Raju Bhai,Bhai Dushyant sevak jee, Bhai Anand Vats jee aur badey bhaiya Satish Mapatpuri jee, aap logo ney meri haujalaafjaai kar aur likhney ki prerna di, Aek baar phir Dhanyavad,
Comment by Vikash Kumar on June 24, 2010 at 11:14pm
Bahot Achha Lag Aapki Kavit. Aur ek Bar Dukh Bhi Ho Raha Hai Ki Hamara Hindustan Aazadi ke Itne Varsho Baad Bhi Aise Kuritiyo Se Mukt Nai Ho Paya Hai. Aap Apni Kavita Ke Madhyam Se Aandolan Karte rahiye Hamara Sahyog Milta Rahega.

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