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हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

2122 1122 1122 22

अपनी आँखों से ये मंज़र नहीं देखे जाते

हाथ में अपनों के खंजर नहीं देखे जाते

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

खूबसूरत हैं बहुत आपकी प्यारी आँखें

गम के है इनमें जो सागर नहीं देखे जाते

याद गावों की मुझे अब भी सताती है बहुत

अपने पुरखों के ये खण्डर नहीं देखे जाते

हादसे रोज़ ही होते हैं यहाँ पर नादिर

फिर भी क्यूँ तुमसे ये मंज़र नहीं देखे जाते

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on October 4, 2015 at 6:56pm

आदरणीय मदन मोहन जी ,श्याम नारायण जी एवं गिरिराज जी हौसला अफजाई का बहुत शुक्रिया .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:07pm

लाजवाब ! हर शे र बेमिसाल कहे हैं , दिली मुबारक बाद कुबूल करें , आदरणीय नादिर भाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on September 30, 2015 at 5:12pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by Madan Mohan saxena on September 30, 2015 at 2:15pm

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

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