For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

देश को आगे बढ़ाओ नौजवानों बढ़ चलो तुम |

२१२२       २१२२     २१२२         २१२२
देश को आगे बढ़ाओ  नौजवानों बढ़   चलो तुम   |
सो रहे जो आलसी बन साथ लेकर  चढ़ चलो तुम |
यों जवानी   ना गुजर   जाये नशे   में होश खोकर ,
ना समझ का सोच बदलो काम ऐसा गढ़ चलो तुम |
पास ना  आये बुढ़ापा     जोर  ऐसा    आजमाओ ,
काम से कोई डरे  ना चेहरा वो     पढ़ चलो तुम   |
दूर जाते हैं    नशे में छोड़     कर घर बार सारा ,
लत छुडादो नाश वाला लॉग  ऐसा मढ़ चलो तुम |
घर रहे या    नौकरी    में   देश सेवा हो हमेशा ,
माँ  कहीं भूखी मरे वर्मा कभी ना गढ़ चलो तुम  |
 
श्याम नारायण वर्मा 
मौलिक व अप्रकाशित |

Views: 308

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बशर भारतीय on May 26, 2016 at 7:19am
आदरणीय वर्माजी कोशिश अच्छी मगर थोड़ा समय और चाहिए इस ग़ज़ल को
Comment by Samar kabeer on May 25, 2016 at 10:38pm
जनाब श्याम नारायण वर्मा साहिब आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 25, 2016 at 8:57pm

अच्छा प्रयास हुआ है आदरणीय | 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 25, 2016 at 7:20pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, अच्छा प्रयास है आपका गजल पर. आपके लगभग हर शेर में 'ना' का प्रयोग हुआ है.जबकि शायर तो इस पर एतराज करते हैं. देख लें. 

यों जवानी   ना गुजर   जाये नशे   में होश खोकर ,

ना समझ का सोच बदलो काम ऐसा गढ़ चलो तुम |.............नासमझ का/की सोच बदलो //काम ऐसा गढ़ //चलो तुम. गढ़ना  अर्थात किसी वस्तु को तराशकर तैयार करना, काम को कैसे गढ़ा जाएगा ?देख लें. सादर.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"//आठवें शेर में पर का अर्थ दूसरों से है । // जनाब लक्ष्मण धामी भाई जी, 'पर' शब्द को…"
6 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय अबोध बालक जी, हौसला बढ़ाने के लिए आभार। "
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' नमस्कार। भाई बहुत बहुत धन्यवाद। "
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय गुरप्रीत सिंह 'जम्मू' जी आभारी हूँ। आपने सही कहा ,सर् का मार्गदर्शन मिलना हमारी…"
yesterday
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। बहुत खूबसूरत आपने मतला बना दिया। सच बताऊं सर् मैंने जो सानी बदलने के…"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"धन्यवाद लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी, मेरी तरफ़ से भी आपको और सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"ओबीओ परिवार के समस्त सदस्यों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..."
Tuesday
DR ARUN KUMAR SHASTRI commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"गजल में आपकी सादगी का गुमां मुझको हुआ है //लम्हा लम्हा हरफ ब हरफ बानगी से जुडा हुआ है…"
Monday
Samar kabeer commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"बहुत शुक्रिय: प्रिय ।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"रूह के पार मुझको बुलाती रही' क्या कहने.. आ. भाई समर जी।"
Monday
Samar kabeer commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"भाई गुरप्रीत सिंह जी आदाब, बहुत अर्से बाद ओबीओ पर आपको देख कर ख़ुशी हुई ।"
Monday
Gurpreet Singh jammu commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"/रूह*हर दर्द अपना भुलाती रही// यूँ कहें तो:- 'रूह के पार मुझको बुलाती रही वाह वाह आदरणीय समर…"
Monday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service