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मुक्तक

जिसेे भी देखिये नख शिख तलक मानव नही लगता।
लिए बम वासना शमसीर हक मानव नही लगता।।
मुसीबत ने यहाँ मुफ़लिस किसानो को रुलाया है. .
बड़ी ताकत कहूं जो यार तक मानव नही लगता।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 20, 2016 at 3:28pm

आदरणीया कल्पना जी व भाई सतविंदर जी का हार्दिक आभार।  सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 13, 2016 at 12:48pm
सत्य उवाच!
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 12, 2016 at 5:20pm
बढ़िया बात कहि है । बधाई आदरणीय ।

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