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हमें साथ रहते दस वर्ष बीत गये

दस बड़ी अजीब संख्या है

 

ये कहती है कि दायीं तरफ बैठा एक

मैं हूँ

तुम शून्य हो

 

मिलकर भले ही हम एक दूसरे से बहुत अधिक हैं

मगर अकेले तुम अस्तित्वहीन हो

 

हम ग्यारह वर्ष बाद उत्सव मनाएँगें

क्योंकि अगर कोई जादूगर हमें एक संख्या में बदल दे

तो हम ग्यारह होंगे

दस नहीं

-------

(मौलिक एवंं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 10, 2017 at 2:25pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी, एवं समर साहब 

Comment by Samar kabeer on November 10, 2016 at 9:06pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार जी आदाब,नई सोच जब भी सामने आती है,बड़ी ही अच्छी लगती है,कविता अच्छी लगी,लिखने का अंदाज़ अच्छा लगा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 2:59pm

आदरनीय धर्मेन्द्र भाई , दस और ग्यारह का अच्छा विश्लेषण किया आपने , कविता के लिये खूब बधाई आपको ।

कृपया ध्यान दे...

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