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2122 1212 22/112

ख़्वाब तूने कोई बुना होगा

तब तेरा रतजगा हुआ होगा

 

सर यक़ीनन मेरा झुकेगा जनाब

आपसे जब भी सामना होगा

 

मुद्दतों बाद मेरी याद आई

मुश्किलों से कहीं घिरा होगा

 

मुझको मेहनत लगी थी लिखने में

उसको एहसास इसका क्या होगा

 

शहर में होना आरज़ी है मगर

तज़्किरा मेरा बारहा होगा

 

आरज़ी – थोड़े समय के लिए, तज़्किरा – जिक्र

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on September 21, 2017 at 8:05pm

शहर में होना आरज़ी है मगर
तज़्किरा मेरा बारहा होगा

वाह आदरणीय वाह ... बहुत ही बेहतरीन अशआर हुए हैं। इस दिलकश ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए दिल मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।

Comment by Samar kabeer on September 21, 2017 at 5:43pm
जनाब शिज्जु शकूर साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on September 21, 2017 at 5:26pm
आदरणीय शिज्जू शकूर जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । बधाई क़ुबूल करें ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 21, 2017 at 3:52pm

आ. शिज्जू भाई.
ख़ूब ग़ज़ल हुई है
बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2017 at 12:08pm
बहुत बहुत शुक्रिया जनाब सलीम साहब यहाँँ एक अतिरिक्त लघु लेने की छूट है
Comment by SALIM RAZA REWA on September 21, 2017 at 12:02pm
जनाब शिज्जु "शकूर",साहब
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद,
सर यक़ीनन मेरा झुकेगा जनाब, इसमे बह्र बढ़ रही है,
आप जनाब के जगह पर 'ही' करने से बात बन जाएगी ,

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