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ग़ज़ल
वो न देगा दान मन्दिर के लिये
कुछ नहीं रब एक काफ़िर के लिये

लोग जिसकी शान में दिल से झुकें
ताज ऐसा चाहिए सिर के लिये

हौसला जिंदा रहे दिल में अगर
मुश्किलें क्या हैं मुसाफ़िर के लिये

इक पहेली बन गया है ऐ सनम
अक्स तेरा हर मुसव्विर के लिये

जाम,साकी,फूल ,तितली भूल जा
कुछ तो लिख तू दौरे हाज़िर के लिये

जिस्म ही वो चाहता है,दिल नहीं
प्यार है इक खेल शातिर के लिये

ज़ीस्त में कुछ तो कमा ले नेकियां
एक पल तो सोच आख़िर के लिये

कम नहीं था इक इबादत से 'अहद'
हर ग़ज़ल हर गीत साहिर के लिये !

अमित "अहद "
( सहारनपुर)


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 29, 2017 at 11:04am
जनाब यमित'अहद'साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
अगर शब्ददकोष के हिसाब से देखें तो मतले के सानी मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,क्योंकि सही शब्द है "काफ़र",देखियेगा ।

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