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बहुत देख ली आडंबरी दुनिया के झरोखों से 

बहुत उकेर लिए मुझे कहानी क़िस्सागो में 

लद गए वो दिन, कैद थी परम्पराओं के पिंजरे में 

भटकती थी अपने आपको तलाशने में  

उलझती थी,  अपने सवालों के जबाव ढूँढने में 

तमन्ना थी बंद मुट्ठी के सपनों को पूरा करने की 

उतावली,आतुर हकीकत की दुनिया जीने की 

दासता की जंजीरों को तोड़

,लालायित हूँ मुक्त आकाश में उड़ने को 

 लेकिन अब उठ गए इन्क्लाबी कदम 

बेखौफ हूँ,कोइ भी बंदिशे रोक ना पाएगी 

अड़चनों के आगे हौसले पस्त होंगे नहीं 

किताब के पन्ने बदल एक नई इबारत लिखूँगी 

जीने  का मकसद मिला,खुशियां दामन  में होगी 

बदलेगा आलम,चाहते मुखर हो परवान चढ़ेगी 

आस है तो ,आसमान हैं

इरादे नेक हैं तो मंजिले तय हैं. 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by babitagupta on August 1, 2018 at 6:02pm

सधन्यवाद ,आदरणीय विजय सरजी।

Comment by vijay nikore on August 1, 2018 at 2:13pm

कविता अच्छी लिखी है।

//किताब के पन्ने बदल एक नई इबारत लिखूँगी //. वाह !

आपको बधाई, बबीता जी।

Comment by babitagupta on July 31, 2018 at 8:02pm

सध्न्यवाद,आदरणीय समर सरजी।

Comment by Samar kabeer on July 31, 2018 at 6:07pm

मुहतरमा बबीता गुप्ता जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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