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इस तरह जिन्दगी तमाम करें

इस तरह जिन्दगी तमाम करें
लोग आ कर हमें सलाम करें
झूठ का अब न एहतराम करें
इस तरह का भी इंतिजाम करें
तू वना खुद को इस तरह शीशा
देख चेहरा सभी सलाम करें
इस तरह वख्श बन्दगी दाता
सुबह से शाम राम-राम करें
आप के हाथ अब नहीं बाजी
आप अब और कोई काम करें
आज तौफिक दे खुदा सबको
देश पर जां लुटा के नाम करें
देख नफरत उदास है “तन्हा”
आस्तां में कहीं कयाम करें
मुनीश “तन्हा”
मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 11:36am

जनाब मुनीश तन्हा जी आदाब,तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

कुछ मिसरों में टंकण त्रुटियाँ देखें ।

'  आज तौफिक दे खुदा सबको'

इस मिसरे में 'तौफिक' को "तौफ़ीक़" कर लें ।

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 10:57am

आदरणीय मुनीश तनहा जी, आदाब. ग़ज़ल की पेशकश पर दाद के साथ मुबारकबाद. सादर. 

कृपया ध्यान दे...

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