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२१२२,२१२२,२१२२,२१२

दिल मुहब्बत,लब ख़ुशी,चेह्रा हसीं,क्या शान है

लग रहा है मुझको तेरा नाम हिंदुस्तान है |

छत टपकती ,फर्श मिट्टी का ,मकाँ कच्चा सही

आज़मा ले तू ,बहुत पक्का मेरा ईमान है |

चाँद कल गुमसुम खड़ा था ,देख कर चेहरा तेरा

आज लगता है मुझे सूरज भी कुछ हैरान है |

मै मना कैसे करूँ ,उसकी किसी भी बात को

नर्म लहजा साथ में इक मद भरी मुस्कान है |

हादिसे अखबार के बस पेज भरते हैं यहां

कुछ बदलता ही नहीं ,क्यूँ इतनी सस्ती जान है |

हार जाये ग़र यहां सच झूट से हैरत न कर

आँख पर पट्टी बंधी है , हाथ में मीज़ान है |

याद करके मै न तड़पूँगा तुझे सुन बेवफा

जा मुझे तू छोड़ जा इसमें तेरा नुकसान है|

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Md. Anis arman on January 10, 2019 at 1:04pm

लिखे को मान  देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया समर  सर 

Comment by Samar kabeer on January 10, 2019 at 11:40am

जनाब अनीस शैख़ साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

कुछ मिसरों में टंकण त्रुटियां देख लें ।

Comment by Md. Anis arman on January 9, 2019 at 1:37pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया विजय निकोर जी 

Comment by vijay nikore on January 9, 2019 at 1:09pm

जनाब मोहम्मद अनीस शेख़ जी, अच्छी गज़ल कही है। बधाई।

Comment by Md. Anis arman on January 7, 2019 at 8:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया महेंद्र कुमार जी 

Comment by Mahendra Kumar on January 7, 2019 at 7:50pm

हार जाये ग़र यहां सच झूट से हैरत न कर

आँख पर पट्टी बंधी है, हाथ में मीज़ान है |

आदरणीय मोहम्मद अनीस शेख़ जी, अच्छी ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं, देख लीजिएगा. सादर.

Comment by Md. Anis arman on January 7, 2019 at 10:41am

राज़ साहब बहुत बहुत शुक्रिया ,टाइप करते वक़्त ध्यान नई दे पाया था सुधार कर लिया हूँ 

Comment by राज़ नवादवी on January 6, 2019 at 1:23pm

आदरणीय Md. anis sheikh साहब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें. 'मुश्कान' को मुस्कान कर लें. बाक़ी मंच के उस्ताज़ नज़रे इस्लाह फ़रमाएंगे. सादर. 

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