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*इज्जत*
(ताटंक छन्द)

इज्जत देना जब सीखोगे, इज्जत खुद भी पाओगे,
नेक राह पर चलकर देखो, कितना सबको भाओगे।

शब्द बाँधते हर रिश्ते को, शब्द तोड़ते नातों को।
मधुर भाव जो मन में पनपे, बहरा समझे बातों को।

तनय सुता वनिता माता सब,भूखे प्रेम के होते हैं,
कड़वाहट से व्यथित होय ये, आँसू पीकर सोते हैं।

इज्जत की रोटी जो खाते, सीना ताने जीते हैं,
नींद चैन की उनको आती, अमृत सम जल पीते हैं।

नारी का गहना है इज्जत, भावों की वह माता है,
शब्द प्रेम के सुनकर उसका , हृदय पिघल ही जाता है।

अपनों की इज्जत सब करना, अपने अपने होते हैं,
अपनों को जो ठोकर मारे, अपनी इज्जत खोते हैं।

जो बोयेंगे खुद हम पायें, फिर कैसी नादानी है,
सबकी इज्जत करनी हमको, ये अपनी मनमानी है।

मौलिक व अप्रकाशित



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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:41am

बढ़िया रचना है आदरणीया सुचिसंदीप जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. आदरणीय समर कबीर सर की बात से मैं भी सहमत हूँ. सादर.

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 11, 2019 at 5:09am

आदरणीय भाई समर कबीर जी आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन पाकर धन्य हुई। बहुत बहुत आभार आपका।

Comment by Samar kabeer on January 10, 2019 at 8:58pm

बहना सुचिसंदीप अग्रवाल जी आदाब,ताटंक छन्द का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'कड़वाहट से व्यथित होय ये, आँसू पीकर सोते हैं'

  1. इस पंक्ति का शिल्प कमज़ोर है,देखियेग़ा ।

'अपनों को जो ठोकर मारे, अपनी इज्जत खोते हैं'

इस पंक्ति में 'मारे' को "मारें" कर लें ।

'जो बोयेंगे खुद हम पायें, फिर कैसी नादानी है,
सबकी इज्जत करनी हमको, ये अपनी मनमानी है'

इन पंक्तियों को अगर यूँ कर लें तो गेयता बढ़ जाएगी:-

"जो बोयेंगे वो पायेंगे, फिर कैसी नादानी है

सबकी इज़्ज़त करना हमको,बात यही समझानी है'

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