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(1)
सारे घर के लोग हम, निकले घर से आज
टाटा गाड़ी साथ ले, निपटा कर सब काज।
निपटा कर सब काज, मौज मस्ती थी छाई
तभी हुआ व्यवधान, एक ट्रक थी टकराई।
ट्रक पे लिखा पढ़ हाय, दिखे दिन में ही तारे
'मिलेंगे कल फिर बाय', हो गए घायल सारे।।

(2)
खोया खोया चाँद था, सुखद मिलन की रात
शीतल मन्द बयार थी, रिमझिम सी बरसात।
रिमझिम सी बरसात, प्रेम की अगन लगाये
जोड़ा बैठा साथ, बात की आस लगाये।
गूंगा वर सकुचाय, गोद में उसकी सोया
बहरी दुल्हन पाय, चैन जीवन का खोया।

(3)
गौरी बैठी आड़ में, ओढ़ दुप्पटा लाल
दूरबीन से देखकर, होवे मालामाल
होवे मालामाल, दौड़ जंगल में भागा
पीछे कुत्ते चार, हांपने मजनू लागा
हांडी गोल मटोल, नहीं कोई भी छोरी
हरित खेत लहराय, खेत की थी वो गौरी।।

(4)
रोटी बोली साग से, सुनो व्यथा भरतार
गूंथ गूंथ बेलन रखे, मारे नित नर- नार।
मारे नित नर -नार, पीड़ सब सह लेती हूं
खाकर भी बिसराय, तभी मैं रो पड़ती हूँ।
पिज़्ज़ा बर्गर खाय, करेंगे बुद्धि मोटी
पड़ेंगे जब बिमार, याद तब आये रोटी।

(5)
फूफा-जीजा साथ में, दूर खड़े मुख मोड़
नया जवाई आ गया, कौन करे अब कोड़।
कौन करे अब कोड़, आग मन में लगती है,
राजा साडू आज, उसे आँखें तकती है।
रगड़ रहा ससुराल, समझ हमको अब लूफा
हुए पुरातन वस्त्र, रो रहे जीजा-फूफा।8

(6)
बहना तुमसे ही कहूँ, अपने हिय की बात
जीजा तेरा कवि बना, बोले सारी रात
बोले सारी रात, नींद में कविता गाये
भृकुटी अपनी तान, वीर रस गान सुनाये
प्रकट करे आभार, गजब ढाता यह कहना
धरकर मेरा हाथ, कहे आभारी बहना।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Hariom Shrivastava on January 20, 2019 at 12:08am

आदरणीया सुचिसंदीप अग्रवाल जी,हास्य से भरपूर बहुत सुंदर कुण्डलिया छंद सृजित हुए हैं। किंतु शिल्प पर कार्य शेष है। कुछ जगहों पर प्रवाह बाधित है व मात्रात्मक भी असंतुलन है।

Comment by Hariom Shrivastava on January 20, 2019 at 12:03am
  1. आदरणीया सुचिसंदीप अग्रवाल जी,बहुत सुंदर हास्य से सराबोर कुण्डलिया छंद रचे हैं,किंतु अभी शिल्प पर कार्य शेष है। कुछ जगहोंं पर प्रवाह ब धित है व मात्रात्मक असंतुलन है।
Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 18, 2019 at 7:26pm

आ लक्ष्मण मुसाफ़िर जी, अतिशय आभार आपका।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 18, 2019 at 4:04pm

आ. सुचिसंदीप जी, बेहतरीन हास्य कुंडलियाँ हुयी हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 18, 2019 at 3:31pm

हार्दिक आभार आ भाई समर कबीर जी। त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करवाने हेतु बहुत आभारी हूँ आपकी।

Comment by Samar kabeer on January 18, 2019 at 3:10pm

बहना सुचिसंदीप अग्रवाल जी आदाब,हास्य व्यंग के अच्छे कुण्डलिया छन्द रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'ट्रक पे लिखा पढ़ हाय'--12 मात्रा

'मिलेंगे कल फिर बाय'--12 मात्रा

'ओढ़ दुप्पटा लाल'

"ओढ़ दुपट्टा लाल"

Comment by नाथ सोनांचली on January 18, 2019 at 2:02pm

हाहाहा हाहाहा,, अरे ऐसा नहीं है बहन सुचिसंदीप अग्रवाल जी। मैं इसे हास्य व्यंग्य के रूप में ही लिया और पढ़ा है, अपने ऊपर लेने का कोई तुक ही नहीं।

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 18, 2019 at 1:36pm

भाई सुरेंद्र नाथ सिंह जी, प्रोत्साहन एवम सराहना हेतु कोटिशः आभार आपका। मजाक कर रही हूँ कि लगता है अंतिम कुंडलिया आपने अपने ऊपर ले ली है। 

Comment by नाथ सोनांचली on January 18, 2019 at 9:53am

आद0 सुचिसंदीप अग्रवाल सादर अभिवादन। बढिया कुण्डलिया लिखी आपने,, हास्य भी गजब का ओत प्रोत हुआ। अंतिम कुण्डलिया बेहद हस्यव्यंग की रही। बधाई स्वीकार कीजिये।

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