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ग़ज़ल (मिट चुके हैं प्यार में कितने ही सूरत देख कर)

ग़ज़ल (मिट चुके हैं प्यार में कितने ही सूरत देख कर)
(फाइ ला तुन _फाइ ला तुन _फाइ ला तुन _फाइ लु न)

मिट चुके हैं प्यार में कितने ही सूरत देख कर l
कीजिए गा हुस्न वालों से मुहब्बत देख कर l

मुझको आसारे मुसीबत का गुमां होने लगा
यक बयक उनका करम उनकी इनायत देख कर l

कुछ भी हो सकता है महफ़िल में संभल कर बैठिए
आ रहा हूँ उनकी आँखों में क़यामत देख कर l

देखता है कौन इज्ज़त और सीरत आज कल
जोड़ते हैं लोग रिश्ते सिर्फ़ दौलत देख कर l

आने वाली है तबाही मुल्क में लगता है ये
डूबी मज़हब के समुन्दर में सियासत देख कर l

प्यार जिसका आज तक हासिल न कर पाया कोई
उसके कूचे में परखना अपनी क़िस्मत देख कर l

इश्क़ में भी अब तिजा रत हो रही तस्दीक है
तुम किसी भी महजबीं से करना उलफत देख कर l

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 13, 2019 at 8:24am

जनाब बलराम साहिब  , ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Balram Dhakar on February 11, 2019 at 11:09pm

आदरणीय तस्दीक़ भाई, ग़ज़ल के सभी शेर क़ाबिले तारीफ़ हैं।

दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमाएं।

सादर।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 5, 2019 at 2:37pm

जनाब भाई लक्ष्मण धा मी साहिब, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रियाऔर हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I  

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2019 at 7:15am

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

आने वाली है तबाही मुल्क में लगता है ये
डूबी मज़हब के समुन्दर में सियासत देख कर l

बहुत खूब..

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 4, 2019 at 9:47pm

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब, ग़ज़ल पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Samar kabeer on February 4, 2019 at 9:19pm

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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