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कविता -तुम्हें मेरी फ़िक्र कहाँ है


तुम्हें मेरी फिक्र कहाँ है
साँझ के आगोश में
दिन भर की थकान
राहत ले रही है
विश्वास की लौ धीरे-धीरे टिमटिमा रही है
ऐसे में अब तुम्हारी प्रतीक्षा शेष है
तुम्हें मेरा वादा कहाँ याद है
कह दो आज फिर मैं झूठ नहीं बोलूँगा
तुम्हारे झूठ पर मेरा विश्वास टिका है
शहर के कॉफी हाऊस से
बूढ़ों की टोलियाँ भी घर जा रही है
मस्जिद की मीनार और
मंदिर के कलश पर
दिन भर मंडराने वाले
कबूतरों का झुंड भी चला गया है
ऐसे में मेरे भरोसे की पतवार कहाँ है
बच्चे भी माँ के साथ
घोसले में दुबक गए हैं
और माँ ने आख़िरी तिनके से
घोसला पूरी तरह से ढँक दिया है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on February 21, 2019 at 5:02pm

आदरणीय मो आरिफ साहब सुंदर भावों से सजी अच्छी कविता के लिए दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए

कृपया ध्यान दे...

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