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फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

दर्द आहों में बदलने क्यूँ लगी कुर्वानियाँ

जान लेने को खड़े तैयार सारे आदमी

हर जगह बढ़ने लगी है आज कल विरानियाँ

घूमते थे रात दिन हम आपकी ही चाह में

जब समझ आया खुदा तो हो गईं आसानियाँ

जोड़ तिनके है बनाया आशियाँ तुम सोच लो

आबरू इस में छुपी है मत करो नादानियाँ

गंध आने है लगी क्यूँ फिर यहाँ बारूद की

याद कर तू बस खुदा को छोड़ बेईमानियाँ

आदमी मजबूर देखो हो गया इस दौर में

खून में शामिल हुई क्यूँ सोच नाफर्मानियाँ

मुनीश “तन्हा” नादौन

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on March 17, 2019 at 4:55pm

आद0 मुनीश तन्हा जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने और आद0 समर साहब की इस्लाह से और बेहतरीन हो गयी। बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 15, 2019 at 7:02pm

आ. भाई मुनीश जी, गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 2:33pm

जनाब मुनीश "तन्हा" जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

दर्द आहों में बदलने क्यूँ लगी कुर्वानियाँ'

ऊला मिसरे में 'है' को "हैं" औए 'देखों' को "देखो" कर लें,और सानी मिसरे में 'लगी' को "लगीं" कर लें ।

'हर जगह बढ़ने लगी है आज कल विरानियाँ'

इस मिसरे में 'है' को "हैं" कर लें ।

'गंध आने है लगी क्यूँ फिर यहाँ बारूद की'

इस मिसरे को यूँ कर लें,गेयता बढ़ जाएगी:-

'गंध क्यों आने लगी है फिर यहाँ बारूद की'

कुछ शब्दों में नुक़्ते नहीं लगाए हैं आपने,देख लें ।

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