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आख़िर क्यों पूछे तू ऐसे प्रश्न
नियति, जिनके उत्तर
ख़ुद तुझको ही स्वीकार नहीं ??
चाहे दुर्गम हों राहें पर सुन-
कर्मठता लिखे हमेशा जीत
कभी भी हार नहीं...
 
नयी कहानी लिख देता अम्बर पर पाखी
पर उसकी किस्मत में सिर्फ झरोखा क्यों है ?
क़तरा-कतरा उखड़ रही ख़्वाहिश उड़ने की
पंखों का होना सच है फिर धोखा क्यों है ?
 
क्यों कश्ती को दिये भँवर-मँझधार,
मिटाया दिशा बोध-
फिर दी कोई पतवार नहीं ??
 
जब-जब रंगों को चुनना चाहा हाथों ने
उड़ीं वहाँ से रंग-बिरंगी सभी तितलियाँ,
अपनों को ही जब आवाज़ लगानी चाही
ठिठक गया स्वर, रुँधे हृदय में बचीं सिसकियाँ,
 
आँखों में ठहरा रूदन तन्हाई का क्यों,
बरसों से
उतरा कोई त्यौहार नहीं ??
 
बहुत मनाया किस्मत के पन्नों को,फिर भी
जाने क्यों सब के सब बरसों से रूठे हैं ?
जो सच्चाई ओढ़ दमकते दिखते हैं वो
अपनेपन के सारे अफ़साने झूठे हैं...
 
शब्दगूँज भावार्थ पूर्ण, पर
जो कण-कण झनकार सहेजें
क्यों ऐसे व्यवहार नहीं ??
मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Hariom Shrivastava on May 15, 2019 at 8:49pm

वाहह,वाहहह,अतिसुंदर रचना

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