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भला करे कश्मीर का, संशोधित सम्विधान - दोहे ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

दोहे

***

वो तो बढ़चढ़ बाँटते, नफरत जिसका नाम
जन्नत में  सद्भावना, शेष  वतन  का  काम।१।
****
वैसे तो हम सब रहे, विविध रंग के फूल
किन्तु सूख अब हो गये, जैसे तीखे शूल।२।
****
पड़े जंग आतंक की, निसदिन जिन पर मार
उन्हें जिन्दगी फिर लगे, बोलो क्यों ना भार।३।
****
तन से तो अब देश में, बिलय हुआ कश्मीर
मन से भी जब हो  बिलय, बदलेगी तस्वीर।४।
****
बिस्थापित थे जो हुये, समझो उनकी पीर
जा पायें निज  ठाॅ॑व  वो, कश्मीरी कश्मीर।५।
****
यहाँ अमन के राह अब, बने न कोई शूल
नयी चली  बयार  से, हटे  दिलों की धूल।६।
****
वो करते  कश्मीर  की, आजादी  की बात
नहीं चाहते जो मिटे, सघन तमस की रात।७।
****
नारा बन कर ना रहे, सबका साथ विकास
जिसकी दसकों से करे, हर कश्मीरी आस।८।
****
केवल कुर्सी के  लिए, जो  नित रहे अधीर
उन लोगों की चाह है, सुलगे फिर कश्मीर।९।
****
शांति,  चैन,  सद्भावना,  बढ़े  देश  से  प्यार
कभी न झुलसे फिर यहाँ, केसर,सेब,चिनार।१०।
****
मन्दिर  की  घन्टी  कहे, बोले  यही  अजान
भला करे कश्मीर का, संशोधित सम्विधान।११।
****
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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