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कुर्सी- एक जादुई छड़ी

त्याग, बलिदान, जोश, श्रम

चार पावों पर खड़ी हूँ मैं

सत्ता की मै बन धुरी

चमक-धमक से सजी-धजी

जादू की फूलझड़ी हूँ मैं

सपनों की सुंदर परी हूँ||

 

महत्वकांक्षा की कड़ी हूँ मैं

स्वागत को तेरे खड़ी हूँ मैं

धैर्य की सबकी परीक्षा लेती

कर्म मार्ग की लड़ी हूँ मैं

नियत, मेहनत का मूल्यांकन करती

तेरे सुख-दुख की कड़ी हूँ मैं||

 

उठक-बैठक कर खेल दिखा

कभी किसी को मौज कराती

कभी प्रशंसा के बोल सुना

सभी से काम कराती

अपना प्रभाव मै दिखा

अहं को सबके धूल मिलाती

पूर्ण स्वार्थ से भरी हूँ मैं ||

 

कभी बन मैं राज सिंहासन

राजाओं की सभा बढ़ाती

कभी किसी की तकदीर बना

रंक से राजा, उसे बनाती

आत्म संयम बन सके जो

बुद्धि उसकी हर मैं जाती||

 

नशा मेरा सिर चढ़ कर बोले

बैठने वाला मेरे मद में डोले

अज्ञानता का प्रभाव डाल मैं

मैं कूटनीति का खेल खेलती

काठ-धातु से बनाई जाती

कुर्सी मैं हूँ कहलाती ||

 

कही सत्ता के गरुर मैंने

निर्दोषों की मौत लिखी

भाई को भाई शत्रु बना

बड़े-बड़े युद्ध की साक्षी बनी

मुझे पाने की लालसा ने

जाने कितनी गाथा लिखी ||

“मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment

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Comment by PHOOL SINGH on September 5, 2019 at 5:19pm

कबीर साहब जी आपका कोटि कोटि धन्यवाद कि आपने मेरी रचना के लिए थोड़ा सा वक्त निकाला|

Comment by Samar kabeer on September 1, 2019 at 2:51pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई,बधाई स्वीकार करें ।

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