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Aazi Tamaam
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Aazi Tamaam posted a blog post

नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगीना दिल से स्याही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगीजिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगाइक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगीफिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगेफिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगेफिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों मेंफिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों मेंफिर कोई कहानी रूहों में हौले हौले घुल जायेगीइक रोज़ लहू ज़म जायेगा इक रोज क़लम थम जायेगीइन आती जाती रूहों का कोई तो जादूगर…See More
5 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' and Aazi Tamaam are now friends
6 hours ago
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"शुक्रिया आदरणीय जनाब अमीर जी हौसला अफ़ज़ाई व मार्गदर्शन के लिये आभार टोके 22 तो 1 दख 2 लं 2 दा 2 ज 1 से 2 खुश 2 बू 2 आती 22 है 2"
yesterday
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल: माँ

2212 2212 2222 2मुझको तेरी आवाज़ से खुशबू आती हैतेरे हर इक अल्फाज़ से खुशबू आती हैआँचल से जैसे इत्र सा झरता रहता हैमाँ तेरे हर अंदाज़ से खुशबू आती हैआसाँ है तेरी हर, इक आहट को सुन लेनादिल को तिरे आग़ाज़ से खुशबू आती हैतू रहती है घर में तो घर, घर सा लगता हैहो साथ अगर हम-साज़ से खुशबू आती हैकोई तो जादू आता है तुझको ओ माँ जोटोके तो दख़ल अंदाज़ से खुशबू आती है(मौलिक व अप्रकाशित) आज़ी तमामSee More
yesterday
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post नज़्म: मटर
"सहृदय शुक्रिया आदरणीय अमीर जी हौसला अफ़ज़ाई के लिये आभार"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Aazi Tamaam's blog post नज़्म: मटर
"जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, अच्छी नज़्म हुई है, मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, प्यारे भावों के साथ ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। 2212 - 2212 - 2222 - 2 "आसाँ है तुझको दूर से ही सुन लेना माँ" इस मिसरे का शिल्प और  इन मिसरों का वाक्य विन्यास दुरुस्त नहीं है- "दिल को…"
yesterday
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"सहृदय शुक्रिया आदरणीय ब्रज जी हौसला अफ़ज़ाई के लिये सादर इसके मापनी हैं 2212 2212 2222 2"
Friday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"बड़े ही प्यारे भाव हैं भाई तमाम जी...इसकी मापनी क्या है?"
Friday
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post नज़्म: मटर
"शुक्रिया आदरणीय धामी सर सहृदय धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई के लिये सादर"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Aazi Tamaam's blog post नज़्म: मटर
"आ. भाई आजी तमाम जी, अभिवादन । अच्छी नज्म हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Friday
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Friday
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Wednesday
Aazi Tamaam commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"सादर प्रणाम आदरणीय धामी सर बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है जब नया देने कि कुव्वत ही नहीं...... गौर कीजियेगा शायद गलती से कि को की व कुव्वत को कुब्बत लिख गया है सादर"
Wednesday
Aazi Tamaam posted blog posts
Apr 5
Aazi Tamaam commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (किसी की याद में...)
"सादर प्रणाम आदरणीय अमीर जी ये ज़िंदगी फ़ना कर दी..... बेहद पसंद आया  सुंदर ग़ज़ल से रू ब रू कराने के लिये आभार"
Apr 4

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Male
City State
Uttar Pradesh
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CHANDAUSI
Profession
Poet, Lawer, Engineer
About me
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नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

ना दिल से स्याही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगी

जिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगा

इक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगी

फिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगे

फिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगे

फिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों में

फिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों में

फिर कोई कहानी रूहों में…

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Posted on April 11, 2021 at 8:12pm

नज़्म: मटर

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है 

तह खोलो बिखरने लगती है

कितने दाने महफूज़ रहते हैं उन फलियों की आगोशी में

कुछ टेढ़े से कुछ बुचके से कुछ फुले से कुछ पिचके से

हू ब हू रिश्तों के जैसे लगते हैं

कुनबे से परिवारों से कुछ सगे या रिश्तेदारों से

पर सभी आज़ाद होना चाहते हैं कैद से

रिवायतों से बंदिशों से बागवाँ से साजिशों से

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है

तह खोलो बिखरने लगती है

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम

Posted on April 8, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

नज़्म: ख़्वाहिश

कोई ख़्वाब न होता आँखों में 

कोई हूक न उठती सीने में

कितनी आसानी होती 

या रब तन्हा जीने में

दिल जब से टूटा चाहत में

रिंद बने पैमानों के

ढलते ढलते ढल गई

सारी उम्र गुजर गई पीने में

यूँ ही सांसें लेते रहना

यूँ ही जीते रहना बस

हर दिन साल के जैसा 'गुजरा

हर इक साल महीने में

दुनिया डूबी लहरों में

हम डूबे यार सफ़ीने में

देखीं कैसी कैसी बातें

अज़ब ग़ज़ब दुनियादारी

वो कितने ना पाक…

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Posted on April 8, 2021 at 11:30am

ग़ज़ल: जैसे जैसे ही ग़ज़ल रुदाद ए कहानी पड़ेगी

2122 1122 2112 2122

जैसे जैसे ही ग़ज़ल रूदाद ए कहानी पड़ेगी

वैसे वैसे ही सनम दिल की फज़ा धानी पड़ेगी

रश्म हर दिल को महब्बत में ये उठानी पड़ेगी

दिल जलाकर भी कसम दिल से ही निभानी पड़ेगी

ख़ुश न होकर भी ख़ुशी दिल में है दिखानी पड़ेगी

कुछ न कहकर भी रज़ा दिल की यूँ सुनानी पड़ेगी

हुस्न वालो की सुनो ना ख़ुद पे भी इतना इतराओ

लम्हा दर लम्हा महंगी तुम्हें न'दानी…

Continue

Posted on April 7, 2021 at 3:00pm

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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