हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो हरि नाम लो।
यह नाम ही है सत्य मानव, भोर लो नित शाम लो।
करते रहो नित भक्ति प्रभु की, नित्य प्रभु आराधना।
तब बिन कहे हर एक होगी, पूर्ण मंगल कामना।।
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आ जाइये प्रभु की शरण में, मोक्ष का सुख पाइये।
नित गाइये प्रभु वन्दना नित, नाम हरि का ध्याइये।
संतोष धन उनको मिलेगा, जो जपेंगे नाम ये।
वह मुक्त होंगे कष्ट से सब, छोड़कर जग धाम ये।।
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जयकार शिव की कर रहे सब, पुण्य सावन मास में।
अर्चक चले कांवड़ उठाए, प्रभु दरस विश्वास में।
शृंगार करतीं नव लताएँ, पिय मिलन की आस में।
उपवास करतीं नारियाँ भी, प्रीति सुख उल्लास में।।
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अर्पित करें शिव को सुगन्धित, पुष्प फल जल द्रव्य भी।
अर्पित करें जन बिल्व के फल, पत्र भी शुचि हव्य भी।
नित पूजते अभिषेक करते, भक्त ले घृत गव्य भी।
नित मंदिरों में भीड़ होती, वस्त्र पहने नव्य भी।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन
Shyam Narain Verma
Aug 6
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार. सादर
Aug 15
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके द्वारा उल्लेखित पंक्तियों को पुनः पढ़कर आवश्यक परिमार्जन करने का प्रयास करता हूँ. सादर
Aug 15