ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा

साथियों,

विगत कई माह से ओ बी ओ लाइव आयोजनों में कतिपय कारणवश सदस्यों की भागीदारी बहुत ही कम हो रही है । विगत दिनों एक अनौपचारिक बातचीत के क्रम में आदरणीय तिलक राज कपूर जी का सुझाव आया कि क्यों न सभी चारों लाइव आयोजनों को माह के प्रथम सप्ताह में लगा दी जाय और एक साथ पूरे माह के लिए लाइव कर दिया जाय, जिससे सदस्यों की सहभागिता बढ़ सकेगी ।

मित्रों, इस विषय पर आप सभी अपना मंतव्य, नवीन विचार रखें ताकि कुछ बेहतर किया जा सके ।

सादर

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    अजय गुप्ता 'अजेय

    सभी की नमस्कार,

    यूँ तो आज आयोजन प्रारंभ ही हुए हैं और किसी प्रकार की टिप्पणी करना उचित नहीं है, किन्तु मंच और कार्यकारिणी को अपने अनुभव से अवगत करवाना भी मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ। 

    ईमानदारी से कहूँ तो मैं चारों आयोजन एक साथ खुले होने के बावजूद किसी एक आयोजन पर ध्यान नहीं लगा पा रहा हूँ। साथ ही उलझन इस बात की है कि कौन से आयोजन में नई रचनाएं आईं होंगी। हर बार टिप्पणी करने के लिए चारों आयोजनों को खोलना भी जटिल लगता है। 

    फिर भी, आयोजन पूरे होते होते स्थिति पूरी स्पष्ट हो जाएगी। इस बार यूँ भी समय कम था तो वो भी एक कारण हो सकता है। फिलहाल हम सब आयोजनों की सफलता के लिए आशान्वित ही रहना चाहेंगे। अन्य सदस्यों के अनुभव मुझ से भिन्न हों, इस बात से भी कोई इनकार नहीं है। 

    सादर 

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      अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

      एक सप्ताह के लिए सभी चार आयोजन के द्वार खुल गए। अच्छी बात ये है कि यह एक प्रयोग है ..... लेकिन किसी को नहीं मालूम यह कितने मास के लिए है। प्रयोग सफल हो गया  तो शायद इसे ही जारी रखेंगे ।

      पुनः एक अनुरोध है ........  अप्रैल मास से प्रयोग 9 दिन का कर दीजिए। 

      तृतीय शनिवार से चतुर्थ रविवार तक  [  दो शनिवार और दो रविवार तो मिलना ही चाहिए ]

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        Chetan Prakash

         दिल रुलाना नहीं कि तुझसे कहें

         हम ज़माना नहीं कि तुझसे कहें 

         फ़क़त अहसास है वो गुनाह का है

         दुख फ़साना नहीं कि तुझसे कहें (गिरह)

         मर चुके जिन्दा ही कहीं हम तो

         प्यार जाना नहीं कि तुझ से कहें 

         तू जो भाया हमें बहुत बात समझ 

         हक़ जताना नहीं कि तुझ से  कहें

         ढूढ़ते प्यार उम्र हो गई है सुन!

         हार जाना नहीं कि तुझ से कहें 

         रू ब रू ज़िन्दगी कभी मिल सकें

         वस्ल होना नहीं कि तुझ से कहें 

         बेसबब जीस्त हो गई 'चेतन'

         तूने माना नहीं कि तुझ से कहें 

        मौलिक व अप्रकाशित