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आदरणीय काव्य-रसिको !
सादर अभिवादन !!
’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ पचहत्तरवाँ आयोजन है।
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छंद का नाम - सरसी छंद
आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
24 जनवरी’ 26 दिन शनिवार से
25 जनवरी’ 26 दिन रविवार तक
केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.
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जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.
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आयोजन सम्बन्धी नोट :
फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
24 जनवरी’ 26 दिन शनिवार से 25 जनवरी’ 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं।
अति आवश्यक सूचना :
छंदोत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम
Chetan Prakash
सरसी छंद : मकर संक्रांति
अनूठे संस्कार हमारे, जुड़े हुए त्यौहार ।
मौसम बदला नहीं जरा सा, बदल गया आहार ।।
सूर्य उत्तरायण होते ही, संक्रांति पर्व यार ।
बनते व्यजंन हर घर तिल से, खाते हम परिवार ।।
अर्ध्य चढ़ाते सूरज को हम, पूजन ईश करार ।
गंगा- स्नान प्रात वेला में, शुद्ध खाद्य परिवार।।
खिचड़ी पापड़ घी तिल सकरी, मिष्ठान्न कई बार ।
पतंग उड़ाते लाल पीली, खाते लड्डू चार ।।
ज्यौं- ज्यौं सूरज चढ़े चढ़ाई, वसन्त हो उत्थान ।
कि खिलने लगी कली कुँवारी, काम सवार सुजान।।
सरसों उग आते फूल कई, दिखते खेत मचान ।
गैंदा हरसिंगार हँसते हैं, पुष्प हर घर उद्यान।।
महिमा वसन्त अनुपम होती, खिलें कमल हैं ग्रीष्म।
नद - नाल सरोवर सुन्दर हैं, भँवर - भँवर हैं प्रीज्म।।
रजत रश्मियाँ आँखों रमतीं, भँवरे रमते फूल ।
गन्ध बसी वन, गूँज बाँसुरी, सुन यमुना कूल ।।
मौलिक व अप्रकाशित
Jan 25
Ashok Kumar Raktale
सरसी छंद
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माह जनवरी आए अबकी, एक साथ दो पर्व।
उनकी ख़ुशी मनाता भारत, देश हमारा सर्व।
प्रथम मकर संक्राति मनाया, दौड़े लिए पतंग।
और पंचमी ऋतु बसंत हम, रहे उड़ाते रंग।।
एक चित्र हैं खींचा जिसका, कैसे करें बखान।
समझ न आता कौन-कौन से, गिनवाएँ पकवान।
तिल गुड़ के लड्डू, लैया हैं, चिक्की औ’ दधि भात।
इतने हैं पकवान कि समझो, थाली बनी परात।।
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~ मौलिक/ अप्रकाशित.
Jan 25
pratibha pande
लड्डू चिवड़ा रेवड़ियों से,सजा हुआ है थाल।
Jan 25