भोजपुरी साहित्य

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अपना बबुआ से // सौरभ

 

कतनो सोचऽ फिकिर करब ना
जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी

कवनो नाता कवना कामें
बबुआ जइबऽ जवना गाँवें
जीउ जाँति के कतनो रहबऽ
लोग न लगिहें तहरा ठावें
बे मौसम के आन्ही-पानी
चलत राहि अलबत्ते मोड़ी
जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी

घर के बान बिसारऽ बबुआ
दुनिया गजब तमासा वाली
माई के अँचरा के बहिरी
मिलिहें भर-भर मनई जाली 

 
डेग-डेग पऽ ठोकर दीही
नवा सीख, भा किस्मत फोड़ी
जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी

लूर सिखावल काम त आई
अगर सीख सङ बुद्धी जागी
जनला आ कइला के अंतर
हर छन मनवा बूझे लागी 

 
असहीं सबही मरद बनेले
कब धावेले लङड़ी घोड़ी
जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी

देवता-पीतर के मरजादा
बाँची-जीही तहरे कान्ही
आपन कुल के बंस-बसाहट
तहरे गोड़े जतरा बान्ही 

 
दिदिया दादी चचऊ के मन
खऽर-जिउतिया माई जोड़ी
जिनिगी के हुलचुल ना छोड़ी
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मौलिक और अप्रकाशित