• दोहा पंचक. . . . .अधर

    दोहा पंचक. . . . . अधरअधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम । जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।स्पर्शों के दौर…

    By Sushil Sarna

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  • निर्वाण नहीं हीं चाहिए

    निर्वाण नहीं हीं चाहिए---------------------------कैसा लगता होगाऊपर से देखते होंगे जबमाँ -बाबाकि जिसमुकाम मकान दुकानखानदान के नाम कोकमाने मेंसारी उम्र लगाईपाई पाई बचाईखुली खुशीसंतति को थमाईसंग मेंथमा दिएविरासत से मिलेसारे उपहारसंस्कारतीज त्यौहारज़मीन व्यापाररात दिनसप्ताह सालसपनो के घरौदे सब घरबारवही…

    By amita tiwari

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  • दोहा सप्तक. . . .युद्ध

    दोहा सप्तक. . . . . युद्धहरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।बेबस जनता भोगती ,  इसका हर  अंजाम ।।दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।खण्डहरों के ढेर पर, सब…

    By Sushil Sarna

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  • वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

    ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बातीपास उनके जो सुनहरा दिल हैताज इक सब के मन के अंदर भीऔर ये शह्र आगरा दिल हैदिल लगी दिल्लगी नहीं होतीइक ग़ज़ब का मुहावरा दिल हैदेखकर उनकी मदभरी आँखेंखो गया मेरा मदभरा दिल हैयाद मुद्दत से वो नहीं है…

    By Jaihind Raipuri

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  • माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    २२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। * कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२। * कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३। * रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी साजन को देख…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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  • दोहा सप्तक. . . . घूस

    दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज । जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।। जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग । घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।। बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम । छोटे आते जाल में, बड़े…

    By Sushil Sarna

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  • दोहा सप्तक. . . . प्यार

    दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा  अनुराग ।।प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध…

    By Sushil Sarna

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  • हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

    बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे सम्विधान तो पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२। * करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३। * खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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  • दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

     अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार । काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।। अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद । शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।। अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात । कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की…

    By Sushil Sarna

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  • घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

    २२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। * गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२। * घर में बहार नल से जो आयी गरीब के पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३। * भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर सारे ही फर्ज, कौम…

    By लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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