2122 1212 22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस कीहो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में मुझ से मुझ ही को दूर करने को आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में तुम ख़यालों में आ जाते हो यूंचीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में चाट कर के अफीम मज़हब कीमरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में ए ग़रीबी…
२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।*दूर नफ़रत का जंजाल करले अगरदो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।*खींचने में लगे पाँव अपने ही अबव्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।*तब मनुज देवता हो गया जान लोलोक मन में अगर कढ़ सके…
दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ । वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध । आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान । संबंधों को लीलती…
आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं। स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।। रण ही है जीवन का नाम दूजा मान कर, कार्य में निरत पग पीछे न हटाते हैं। जग में मनुज वे ही सदा ही सभी के लिए, कर्मवीरता के प्रतिमान बन…
चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव। बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।। * बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब मौन धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।। * मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़ सुख-दुख के साथी …
मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल है जिसकी व्याख्या खेल सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है। खेल सिद्धांत हमें सिखाता है कि जब दो या अधिक खिलाड़ी किसी स्थिति में निर्णय लेते हैं, तो हमेशा सत्य या सही को नहीं चुनते, बल्कि वह विकल्प चुनते…
कुंडलिया. . . . बेटीबेटी से बेटा भला, कहने की है बात । बेटा सुख का सारथी, सुता सहे आघात ।।सुता सहे आघात, पराई हरदम रहती ।जीवन के वह दर्द, सदा ही चुप - चुप सहती ।।जाने कितने रूप,सुता यह ओढ़े लेटी ।सृष्टि सृजन आधार, मगर है मानो बेटी ।।सुशील सरना / 20-1-26मौलिक…
मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के…
जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी मनमर्जी थोपी जाती है नहीं चली तो तोड़ें काठी अहंकार मद भरे विचारों उड़ें हवा में वे गर्दा से .. हठ में अड़ना, जबरन भिड़ना और झूठ रच मन की करना निर्बल अबलों या नन्हों में नाहक वीर बने घुस लड़ना मद में…
कुंडलिया. . . .किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।आँखें उसकी वेदना, नित्य करें साकार ।।नित्य करें साकार , दर्द यह कहा न जाता ।उसे भूख का दंश , सदा ही बड़ा सताता ।।पत्थर पर ही पीठ , टिकाई हरदम इसने ।भूखी काली रात , भाग्य में लिख दी किसने ।।सुशील सरना /…