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kanta roy's Discussions (2,219)

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"बहुत खूब शेर कही है आपने इस ग़ज़ल में कि ,कुछ राज छिपा लेना, कहना न किसी से भी।मुस्कान…"

kanta roy replied Oct 23, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"रिश्ता है अजब उनसे,बस इतना "समर" सुन लोनज़दीक-ए-रग-ए-जाँ हैं पर अपने नहीं होते---- वा…"

kanta roy replied Oct 23, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"है जिसकी बदौलत इस दुनिया में हमारा नामहैं ज़र यही अपने वो, ज़र अपने नहीं होते------व…"

kanta roy replied Oct 23, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"रिश्तों में दरारों से, हालात बदलते हैंवो साथ तो होते हैं, पर अपने नहीं होते---- वाह…"

kanta roy replied Oct 23, 2015 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-64

534 Oct 25, 2015
Reply by मिथिलेश वामनकर

"हर “आम” के दिल मेंदबी होती है कहीं“ख़ास” होने की चाहइसी “चाह” मेंनिहित होते अक्सरखा…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

"भाव मन का भाँप लें हम बिन कहे बातें बनेंआ चलें फिर आजमा लें क्यूँ बताना हो कभी?.....…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

"मन के हो तुम काले सचमुच कृष्णआस भरी वह राधा मरी सतृष्ण------ बहुत ही सुन्दर अनुपम पद…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

"अजब तमाशा है ये ज़िंदगी उम्मीदों की बैसाखियों के सहारे ये साँसों का सफर तय कर जाती है…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

"जीवन में आस की विविधता।  सबके अपने अपने आस और अभिलाष।  बहुत खूब रचना हुई है आदरणीय स…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

"वही सपने ....जो कल भी वही थे ,आज भी वही हैं ,वो बदले नहीं ,दिखाने वाले बदलते रहते है…"

kanta roy replied Oct 10, 2015 to "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-60

280 Oct 11, 2015
Reply by नादिर ख़ान

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२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
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"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
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"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
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"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

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