For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (14,224)

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 24, 2017 at 2:45pm — 8 Comments

'महब्बत कर किसी के संग हो जा'

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



हिमाक़त छोड़ दे फ़रहंग हो जा

महब्बत कर किसी के संग हो जा



ग़ज़ल मेरी सुना लहजे में अपने

मैं गूँगा हूँ मेरा आहंग हो जा



यहाँ घुट घुट के मरने से है बहतर

निकल मैदाँ में मह्व-ए-जंग हो जा



करे अपना के दुनिया फ़ख़्र जिस पर

वफ़ा का वो निराला ढंग हो जा



चढ़े इक बार जिस पर फिर न उतरे

महब्बत का तू ऐसा रंग हो जा



ये दुनिया सीधे साधों की नहीं है

उदासी छोड़ शौख़्-ओ-शंग हो जा



जुदा ता उम्र कोई कर न… Continue

Added by Samar kabeer on July 24, 2017 at 12:00am — 8 Comments

तन्हा...

तन्हा....

बहुत डरता हूँ
हर आने वाली

सहर से 

शायद इसलिए कि
शाम ने सौंपी थी
जो रात
मेरे ख़्वाबों को
जीने के लिए
ढक देगी उसे सहर
अपने पैरहन से
हमेशा के लिए
और मैं
रह जाऊंगा
सहर की शरर से
छलनी हुए
ख्वाबों के साथ
तन्हा

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on July 23, 2017 at 9:18pm — 2 Comments

झंझावात

धूप की तिरछी किरणें

बारिश की बूँदें

रंभाती हवाएँ

सभी एक संग ...

धूल के कण

मानो उड़ रहे हैं सपने

विचित्र रूप ओढ़े है धरती

सारा कमरा

चौकन्ना हो गया है

असंतोष मुझको है गहरा

लौट-लौट आ रहे हैं

दर्दीले दृश्य दूरस्थ हुई दिशाओं से

भूली भीषण अधूरी कहानी-से

उलझे ख़याल ... 

तुम्हारे, मेरे

मकड़ी के जाल में अटके जैसे

हमारे सारे प्रसंग

जिनका आघात

हम दोनों को…

Continue

Added by vijay nikore on July 23, 2017 at 3:00pm — 25 Comments

एक अतुकांत कविता मनोज अहसास

तुम्हें मेरी लिखावट बहुत पसंद थी

और मुझे तुम्हारी

तुम अक्सर कहती

"जैसे घुमा घुमाकर लपेटकर तुम लिखते हो,ऐसे ही मैं भी लिखना चाहता हूं"

मैं भी कई बार सोचता

"जैसे धीरे धीरे ,सोच सोचकर तुम लिखती हो ना ऐसे ही मैं भी लिखना चाहता हूँ"



बहुत दिनों तक साथ साथ लिखते रहे

और देखते रहे

एक दूसरे की लिखावट को

और मेरी लिखावट मिल गई तुम्हारी लिखावट में

और तुम्हारी लिखावट मिल गई मेरी लिखावट में

एक नया लेख बना

जो न तुम्हारा था न मेरा

और हम… Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on July 23, 2017 at 1:22pm — No Comments

लगती रही फिर भी भली

जिन्दगी की रेलगाड़ी,

भागती सरपट चली.

 

मिल न पायीं दो पटरियाँ,

साथ पर चलती रहीं.

देख कर अपनों की खुशियाँ,

दीप बन जलती रहीं.

 

दे गयी राहत सफर में,

चाय की इक केतली.

 

मौसमों की मार…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on July 23, 2017 at 1:11pm — 2 Comments

विरह गीत

हृदय पटल को तेरी यादें , देती चीर।

आकुल रहता मन ये मेरा, सुन बेपीर।



विस्मित होती आत्ममुग्ध सी, थी ये गूँज।

तुझमें सिमटी रहती थी जो, ये अनुगूँज।

पुलकित हो जाया करती थी, हुई अधीर।

हृदय पटल को तेरी यादें, देती चीर।



सुधियों में कर याद तुझे भर , लेती आह।

हुआ हमें अहसास नही अब, बाकी चाह।

किन्तु नही समझे ये आंखें , भरती नीर।

हृदय पटल को तेरी यादें, देती चीर।



आद्र नयन ये हस भी जाएँ, फिर से देख।

प्रेम पुनः जो अंकित करते, हिय… Continue

Added by अनहद गुंजन on July 23, 2017 at 11:44am — No Comments

दुनिया के मर्ज़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भाई, मैंने तो अब सोच लिया है कि अब नहीं रहना संयुक्त परिवार में!"



"अबे, तुम्हारी बीवी की ये पहली प्रेगनेंसी है। कुछ ही महीनों में डिलेवरी होगी। यही तो सही समय है सबके साथ रहने का!"



"साथ रहने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन हर रोज़ की टोका-टाकी और दकियानूसी से तंग आ चुका हूं। मैं नहीं चाहता कि गर्भ में पल रहे बच्चे को शुरू से ही धार्मिक चीज़ें सुनवाई जायें। रीति-रिवाज़ों की छाप उस पर पड़े!"



"क्या तुम्हारी बीवी भी!"



"कहां यार, वह तो भारतीय नारी है न।!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 23, 2017 at 10:47am — 4 Comments

जनता(ब्यथा और प्रण ):-मोहित मुक्त

अन्तर्वेदना से छिन्न-भिन्न

आक्रांत उर की मर्म कराहें ,

अश्रुनिमग्न कातर स्वर में

पूछती हैं किसको पुकारें |

आह भारत-वर्ष हाय

क्या यहीं रह गया है शेष ?

स्वर्णयुक्त इतिहास का-

कुछ ,रहा नहीं भग्न-अवशेष ?

क्यों नहीं कुक्षि तेरी

अब कोई अशोक जन्माती है ?

क्यों नहीं स्वसम्मान की

आज ललकारें लहलहाती हैं ?

जनता कोई खिलौना है-

क्या, गणतंत्रता की सत्ता में ?

नहीं तो फिर गौण-

क्यों ,बन…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on July 23, 2017 at 8:09am — 4 Comments

सोमेश्वर मंदिर ( संस्मरण)

सन १९८२ , बी वाय के कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, शरणपुर रोड, नाशिक , यह उनदिनों की बात है जब मैं इस कॉलेज में पढ़ती थी |

हमारी कॉलेज के पैरेलल दो सड़के जाती थी, एक त्रम्बकेश्वर रोड, और दूसरी गंगापुर रोड , और इन दोनों के बीच पड़ता है हमारा कॉलेज रोड|

हमारे कॉलेज से एक रास्ता कट जाता है जो गंगापुर रोड की तरफ जाता है , कॉलेज से करीब ४.८ किलोमीटर की दुरी पर है यह सोमेश्वर मंदिर | महादेव जी का यह एक प्राचीन मंदिर है , गोदावरी नदी के तट पर बसा यह मंदिर अपनी सुंदरता लिए हुए है | उनदिनों…

Continue

Added by KALPANA BHATT on July 22, 2017 at 7:17pm — 4 Comments

पक्का घड़ा ( लघुकथा )

गाँव वालों के बीच इन दिनों एक ही चर्चा चल रही थी और वो थी सुखिया के  बेटे का आतंकवादी बन जाना  | सुखिया एक सीधा सादा कुम्हार था पर उसके हाथ के बने घड़े सुन्दर और पक्के होते थे | आस पास के गाँव वाले भी उसके पास घड़े खरीदने आते थे |

लोगों को जब उनके बेटे के बारे में पता चला तो वे सब सकते में आ गए ।



किसीने कहा , " घोर कलजुग है भैया , किसीका भरोसा नहीं । "



कोई बोला ," इसमें तो मुझे उस सुखिया कुम्हार की ही गलती दिखे है , माटी के घड़े तो बना दिए पर खुद…

Continue

Added by KALPANA BHATT on July 22, 2017 at 5:47pm — 5 Comments

ग़ज़ल(सुन तो ले दास्ताने बर्बादी ) -----------------------------------------

ग़ज़ल(सुन तो ले दास्ताने बर्बादी )

-----------------------------------------

(फाइलातुन-मफ़ाइलुन-फेलुन )

सुन तो ले दास्ताने बर्बादी |

घर के बाहर खड़ा है फर्यादी |

लोग करते रहे विकास मगर

हम बढ़ाते रहे हैं आबादी |

पी रहा हूँ उन्हें भुलाने को

मैं नहीं हूँ शराब का आदी |

सिर्फ़ ग़म है यही जिसे चाहा

साथ उसके न हो सकी शादी |

क्या दुआ दें तुम्हें सिवा इसके

हो मुबारक ये खाना आबादी…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on July 22, 2017 at 5:41pm — 12 Comments

आलोकग्रह ... (संस्मरण -- डा० रामदरश मिश्र जी)

यह संस्मरण लेखक, कवि, उपन्यासकार डा० रामदरश मिश्र जी के संग बिताय हुए सुखद पलों का है।

सपने प्राय: अप्रासंगिक और असम्बद्ध नहीं होते। कल रात सोने से पूर्व मित्र-भाई रामदरश मिश्र जी से बात हुई तो संयोगवश उनका ही मनोरंजक सपना आया ... सपने में बचपन के किसी गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, कुनकुनी धूप, और बारिश एक संग, ... और उस बारिश में बच्चों-से भागते-दोड़ते रामदरश जी ओर मैं ... कुछ वैसे ही जैसे उनकी सुन्दर कविता “बारिश में भीगते बच्चे” मेरे सपने में जीवंत हो गई…

Continue

Added by vijay nikore on July 22, 2017 at 1:08am — 6 Comments

जाम ... (एक प्रयास)

जाम ... (एक प्रयास)
२१२२ x २

शाम भी है जाम भी है
वस्ल का पैग़ाम भी है।l
हाल अपना क्या कहें अब
बज़्म ये बदनाम भी है।l
हम अकेले ही नहीं अब
सँग अब इलज़ाम भी है।l
बाम पर हैं वो अकेले
सँग सुहानी शाम भी है।l
ख़्वाब डूबे गर्द में सब
संग रूठा गाम भी है।l
ख़ौफ़ क्यूँ है अब अजल से
हर सहर की शाम भी है ll
होश में आएं भला क्यूँ
संग यादे जाम भी है !l


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 21, 2017 at 5:30pm — 15 Comments

शुरूआत (लघुकथा)

“भाभी जल्दी आइये देखिये ‘साथी डॉट कॉम’ पर कितने उत्तर आये हैं|”

“अरे क्या करती हैं बड़े लोग देखेंगे,सुनेंगे तो क्या सोचेंगे |”

“खुश होंगे भाभी, सब चाहते हैं कि आप फिर से एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करें |”

“सालों पहले मुझे सफ़ेद साड़ी से रंगीन साडी पहनाने में, कितने पापड़ बेले थे आपने, भूल गयी क्या, जो अब ये नया काम करने जा रही हैं |”  

“पर मैं सफल हुई ना|थोड़ा सा आत्मविश्वास की ज़रूरत है बस |केदारनाथ के हादसे को हुए भी १२ साल बीत गए हैं ,भाई व बच्चों को तो वापिस नहीं ला…

Continue

Added by Manisha Saxena on July 20, 2017 at 11:30pm — 5 Comments

इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )

2122 -1212 -22

मुझ पे तू मेहरबां नहीं होता
मैं तेरा क़द्रदां नहीं होता।

बोलने वाले कब ये समझेंगे
चुप है जो बेज़ुबां नहीं होता।

कोई अरमान हम भी बोते. . .गर
मौसम-ए-दिल ख़िज़ाँ नहीं होता।

ख्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो
अब मेरा दिल यहां नहीं होता।

जो बचाए किसी को कातिल से
वो सदा पासबाँ नहीं होता।

चाहे कितना उठे धुआँ ऊपर
वो कभी आसमाँ नहीं होता।
(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by Gurpreet Singh on July 20, 2017 at 1:41pm — 13 Comments

मुझको यदि पढ़ना चाहोगे, कई बहाने मिल जाएँगे

यूँ ही.............. 

 

मुझको यदि पढ़ना चाहोगे

कई बहाने मिल जाएँगे

मुझसे यदि बचना चाहोगे

कई बहाने मिल जाएँगे

 

हम दुनियावी मसलों को-

छोड़, यहाँ तक आ पहुंचे हैं

तुम, अपनी फिकरों को छोड़ो

कई बहाने मिल जाएँगे

 

खूब दिखाए बाग-तितलियाँ

औ खूब सुनाई गज़लें भी

कैसे डूब गई मैं तुझमें 

कई बहाने मिल जाएँगे

 

कौन कह रहा तनहा हैं हम

हम से दूर हुए कब तुम थे?

मजबूरी टूटे बस…

Continue

Added by SudhenduOjha on July 20, 2017 at 11:43am — No Comments

अवसादों की खींच-तान हो, तुमको मैंने देखा है

यूँ ही.............. 

 

अवसादों की खींच-तान हो,

तुमको मैंने देखा है

बादल तिरता आस्मान हो

तुमको मैंने देखा है

 

हर कारज के होने में

पाने में या खोने में

तुम ही सब अनुष्ठान हो

तुमको मैंने देखा है

 

आपा-धापी, गला-काट

बात-बात पर लाग-डांट

दुनिया से परेशान हो

तुमको मैंने देखा है

 

जगती के इस रेले में

औ विवाद के ठेले में

जलता सा जब मसान हो

तुमको मैंने देखा…

Continue

Added by SudhenduOjha on July 20, 2017 at 11:27am — 7 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

ये रंजिश का दौर नया है ,

हाँ, साज़िश का दौर नया है ।

कितने बेबस चहरे देखो ,

फिर यूरिश का दौर नया है ।

हम क्या खायें, क्या पहनें अब ,

बस, काविश का दौर नया है ।

भाई-भाई का दुश्मन है ,

ये सोज़िश का दौर नया है ।

शक हर इक पर है अब यारो ,

हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।

धन-दौलत के दीवाने सब ,

पैमाइश का दौर नया है ।

सूखी-सूखी नदियाँ हैं सब ,

अब बारिश का दौर नया है… Continue

Added by Mohammed Arif on July 20, 2017 at 12:07am — 14 Comments

भरोसा (लघुकथा) -सुनील वर्मा

टूटी सड़क| भारी यातायात| साफ सुथरे कपड़े पहने हुए एक युवक बार बार अपने गले में बँधी टाई सही कर रहा था| तभी सामने ने ऑटो आता देख उसने हाथ देकर उसे रोका|

ऑटो में बैठते ही युवक ने चालक को अपने गंतव्य स्थान के बारे में बताया और ज़ेब से फोन निकालकर किसी से बातें करनी शुरू कर दी| देश में बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी और धार्मिक अराजकता पर बातें करता हुआ वह सरकार को कोस ही रहा था कि ऑटो चालक ने अब तक लगभग दो सौ मीटर की दूरी तय करने के बाद आगे बने एक पेट्रोल पंप पर अपना ऑटो रोका|

"साहब पेट्रोल… Continue

Added by Sunil Verma on July 19, 2017 at 9:20am — 5 Comments

Monthly Archives

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार बसंत कुमार शर्मा जी । लेखन सार्थक हुआ ।"
4 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार प्रिय मोहित मुक्त जी ।"
4 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत-बहुत आभार आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ।"
4 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on vijay nikore's blog post झंझावात
"मुहतरम जनाब विजय साहिब , बहुत ही सुंदर अहसास और भाव युक्त कविता हुई है मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
5 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब , बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
5 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
5 hours ago
Satyendra Govind is now a member of Open Books Online
5 hours ago
Tasdiq Ahmed Khan commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल(सुन तो ले दास्ताने बर्बादी ) -----------------------------------------
"जनाब बसंत कुमार साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया "
5 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, बहुत खूबसूरत गजल कही है आपने. बहुत मुबारकबाद कुबूलें. सादर."
6 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on Samar kabeer's blog post 'महब्बत कर किसी के संग हो जा'
"वाह वाह लाजबाब "
7 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"बहुत खूब "
7 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल(सुन तो ले दास्ताने बर्बादी ) -----------------------------------------
"बेहतरीन ग़ज़ल "
7 hours ago

© 2017   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service