For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गहरे तल पर ठहरे तम-सा,

ठहरा यह जीवन।

*

मौन तोड़ती एक न आहट,

घूरे बस निर्जन।

कौन रुका इस सूने पथ पर,

जो होगी खनखन।

घर आँगन दालानों की भी,

छाँव नहीं कोई।

दूर-दूर तक वीराना है,

गाँव नहीं कोई।

चले हवाएँ गला काटतीं,

सर्द बहुत अगहन।

*

कहीं चढ़ाई साँस फुलाए

कहीं ढाल फिसलन।

क़दम-क़दम पर भटकाने को,

ख़ड़ी एक उलझन।

लम्बा रस्ता पार न होता,

कितना चल आये।

चार क़दम पर हाँफ गये सब,

अपने ही साये।

छ्ल-छल करती आँखों ने भी 

पायी बस बिछड़न ।

*

धड़कन की लय टूट रही है,

मन मनके टूटे।

ख़ुशियों को ईर्ष्या की पल-पल,

चढ़ी बाढ़ लूटे।

संघर्षों का अन्त नहीं है,

हो कोई मौसम

चाहे दिन हो उजियारे का

या रातों का तम।

अगवा सारी हुईं उमंगे

बेबस हैं तनमन।

#

अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

मौलिक/अप्रकाशित.

Views: 267

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2025 at 5:28pm

आदरणीय अशोक भाईजी,
आपकी गीत-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाइयाँ

 
एक एकाकी-जीवन का बहुत ही मार्मिक वर्णन हुआ है. गीत के कथ्य में ठहरे हुए जीवन की ऊब और निस्सारता को शाब्दिक किया गया है. आपकी सतत रचना-प्रक्रिया से आपकी रचनाओं को एक विशेष बुनावट मिल गयी है जो एक रचनाकार के लिए उपलब्धि है. यह अवश्य है, कि कई पंक्तियों की व्याख्या तनिक और कसावट चाहती हैं. 

 

गहरे तल पर ठहरे तम-सा, ....   गहरे तल में ठहरे तम-सा

मौन तोड़ती एक न आहट,

घूरे बस निर्जन।
कौन रुका इस सूने पथ पर,
जो होगी खनखन .. ...            इन दोनों पंक्तियों को आपस में बदल लें तो निस्सृत अर्थ तार्किक हो जाएगा. 

 

घर आँगन दालानों की भी,
छाँव नहीं कोई ..............     . इस पंक्ति को तार्किक होना होगा. आंगन की बात समझ में आती है, लेकिन घर और दालान का होना बिना छ्ज्जे के संभव नहीं. भले ही, छज्जा छिन्न-भिन्न हो, टूटा हुआ हो. फिर उनके लिए छाँव का न हो पाना तार्किक नहीं है. इसे यों समझा जा सकता है - घर आंगन दालानों में भी ठाँव नहीं कोई
दूर-दूर तक वीराना है,
गाँव नहीं कोई ... ... ..             अब इस पंक्ति को पहले कर, दूसरी पंक्ति ’घर आंगन दालान..’ को बना लें.

 

चले हवाएँ गला काटतीं ...        देह बेंधती चली हवाएँ  ....
सर्द बहुत अगहन।
*
कहीं चढ़ाई साँस फुलाए .. ..     कभी चढ़ाई साँस फुलाती
कहीं ढाल फिसलन।
क़दम-क़दम पर भटकाने को,
खड़ी एक उलझन।
लम्बा रस्ता पार न होता,
कितना चल आये।
चार क़दम पर हाँफ गये सब,
अपने ही साये।
छ्ल-छल करती आँखों ने भी ... . .आस-मिलन की है आँखों में
पायी बस बिछड़न । ............ ..    पर दीखा बिछड़न
*
धड़कन की लय टूट रही है,
मन मनके टूटे।
ख़ुशियों को ईर्ष्या की पल-पल,
चढ़ी बाढ़ लूटे।
संघर्षों का अन्त नहीं है,
हो कोई मौसम
चाहे दिन हो उजियारे का
या रातों का तम।
अगवा सारी हुईं उमंगे ...........    अब तो हवा उमंगे सारी
बेबस हैं तनमन। 

 

मैंने अपनी समझ से कुछ सुझाव रखे हैं. इन पर सोच कर मुझे भी लाभान्वित कीजिएगा. 

वस्तुतः, गीत का मुखडा एक वातावरण की रचना करता है. फिर उस गीत के अंतरे एक-एक कर उस वातावरण के होने को पुष्ट करते चलते हैं. यही गीति-प्रतीतियों का कुल व्यवहार होता है. कहन को लेकर पूरे गीत में तारतम्यता बनी रहती है

 

आपकी गीत-रचना के लिए पुनः बधाइयाँ
शुभ-शुभ 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2023 at 7:59pm

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। बहुत भावप्रवण गीत हुआ है। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 31, 2023 at 1:30pm

जनाब अशोक रक्ताले जी आदाब, बहुत उम्द: नवगीत लिखा आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on December 27, 2023 at 4:05pm
वाह बेहतरीन 👌 प्रस्तुति सर, हार्दिक बधाई
Comment by pratibha pande on December 27, 2023 at 9:05am

अगवा सारी हुईं उमंगे

  • बेबस हैं तनमन।//वाह... बहुत भावप्रवण नवगीत..हार्दिक बधाई आदरणीय अशोक जी

#

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
yesterday
Admin posted discussions
Tuesday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
Tuesday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
Tuesday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service