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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on विनय कुमार's blog post पिता--लघुकथा
"आ. भाई विनय कुमार जी, अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post कल कहा था आज भी कल भी कहो..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeta Tayal's blog post वो बीता हुआ बचपन
"आ. नीता जी, अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post मातृभाषा हिंदी
"आ. भाई सुरेश कल्याण जी, सादर अभिवादन । हिन्दी दिवस पर सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post हिन्दी दिवस पर कुछ दोहे :
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । हिन्दी दिवस पर सुंदर दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई । ७ वें दोहे में दास्ता की जगह दासता कर लीजिएगा । सादर ..."
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुतपर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।**सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफसुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।**कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गयाउससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।**पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।**बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो रुदालियाँबजती थी जिस भी गाँव में शहनाइयाँ बहुत।५।मौलिक-अप्रकाशितलक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'See More
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की -वो कहता है मेरे दिल का कोना कोना देख लिया
"आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । इस बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति स्नेह व मार्गदर्शन के लिए आभार ।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई हर्ष महाजन की , सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।"
Tuesday
Samar kabeer commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'रहती हैं साथ उसके पर बरबादियाँ बहुत' ये मिसरा बह्र में नहीं है, यूँ कर सकते हैं:- 'पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत'"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Saurabh Pandey's blog post हिंदी-दिवस : चार दोहे // सौरभ
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन । हिन्दी दिवस की सच्चाई उजागर करते उत्तम दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई । हिन्दी का गुणगान कर, बढ़चढ़ कर सब आजकल से फिर नियमित करो, अंग्रेजी में काज।।**बच्चे सब कन्वेन्ट में, बढ़चढ़ पढ़ने भेजहिन्दी के सम्मान में, इक दिन चीखो…"
Monday
Harash Mahajan commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरनीय भाई  लक्ष्मण धामी जी आदाब । बहुत सुंदर सृजन । "सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ सुनते हैं उस  को बेहतरीन । भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत" सादर"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुतपर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।**सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफसुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।**कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गयाउससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।**पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।**बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो रुदालियाँबजती थी जिस भी गाँव में शहनाइयाँ बहुत।५।मौलिक-अप्रकाशितलक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत : अमावस की कविता (गणेश बाग़ी)
"आ. भाई गणेष जी, सादर अभिवादन ।सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Harash Mahajan's blog post लौटकर शख्स मेरे दर पे यूँ आया होगा
"आ. भाई हर्ष महाजन जी, सादर अभिवादन ।गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर आपकी उपस्थिति से लेखन सफल हुआ । स्नेह के लिए हार्दिक आभार ।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आजकल खुद से हमारी पट रही है - गजल
"आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Sunday
Samar kabeer commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Madhu Passi 'महक''s blog post श्राद्ध
"आ. मधु महक जी , अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Sep 13
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeta Tayal's blog post हिन्दी बोलने में ना सकुचेंगे
"आ. नीता जी, सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Sep 13

Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Dharchaula,uttarakhand
Profession
teaching

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुत

पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।

**

सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।

**

कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गया

उससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।

**

पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ 

चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।

**

बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो…

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Posted on September 14, 2020 at 7:30am — 4 Comments

कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

जिनके धन्धे  दोहन  वाले  कब  धरती का दुख समझे

सुन्दर तन औ' मन के काले कब धरती का दुख समझे।१।

**

जिसने समझा थाती धरा को वो घावों को भरता नित

केवल शोर  मचाने  वाले  कब  धरती का दुख समझे।२।

**

ताल, तलैया, झरने, नदिया इस के दुख में सूखे नित

और नदी सा बनते नाले  कब धरती का दुख समझे।३।

**

पेड़ कटे तो बादल  रूठा  और  हवाएँ  सब झपटीं

ये सड़कों के बढ़ते जाले कब धरती का दुख समझे।४।

**

नित्य सितारों से गलबहियाँ उनकी तो हो…

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Posted on September 12, 2020 at 5:58am — 6 Comments

सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं -गजल

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



अकेलेपन को भी हमने किया चौपाल के जैसा

बचा लेगा दुखों में  ये  हमें  फिर ढाल के जैसा।१।

**

भले ही दुश्मनी कितनी मगर आशीष हम देते

कभी दुश्मन न देखे बीसवें इस साल के जैसा।२।

**

इसी से है जगतभर में हरापन जो भी दिखता है

हमारे मन का सागर  ये  न  सूखे ताल के जैसा।३।

**

सितारे अपने भी जगमग न कमतर चाँद से होते

अगर ये भाग्य भी  होता  चमकते भाल के…

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Posted on September 10, 2020 at 7:42pm — 2 Comments

स्वाधीन हो के भी कहाँ स्वाधीन हम हुए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



फेंका जो होता आप ने पत्थर सधा हुआ

दिखता जरूर भेड़िया घायल गिरा हुआ।१।

**

हर बार अपनी चाल जो होती नहीं सफल

है दुश्मनों से  आज  भी  कोई मिला हुआ।२।

**

स्वाधीन हो के  भी कहाँ स्वाधीन हम हुए

फिरता न यूँ ही हाथ ले फदली कटा हुआ।३।

**

रोटी मिली न मुझको न तुझको खुशी मिली

ऐसी गजल से बोल तो किस का भला हुआ।४।

**

कल तक जो हँसता खेल के चिंगारियों से था

रोता है आज  देख  के  निज  घर जला हुआ।५।

**

मैं जुगनुओं को मुँह…

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Posted on August 27, 2020 at 7:17pm — 4 Comments

Comment Wall (17 comments)

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At 8:37am on May 14, 2020, Om Prakash Agrawal said…
आदरणीय
सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद
At 4:12pm on May 7, 2020, सालिक गणवीर said…
हौसला अफजाई के लिए आपका ममनून हूँ आदरणीय
At 10:58am on October 18, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत शुक्रिया
At 2:30pm on September 28, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' जी बहुत बहुत शुक्रिया हौसला अफ़जाई का आपने समय निकाला मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ
At 10:47am on August 24, 2019, dandpani nahak said…
बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्षमण धामी जी
At 10:03pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब
बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने के लिए!
At 4:04pm on August 8, 2018, babita garg said…

शुक्रिया लक्ष्मण जी

At 11:44am on March 3, 2018, Sanjay Kumar said…
बहुत बहुत धन्यवाद और आभार। कोशिश करूंगा कि कुछ योगदान कर सकूं। बस हौसला अफजाई करते रहिएगा और जहां जरूरी हो तो कुछ सिखा दीजियेगा। सादर
At 5:20pm on January 10, 2018, dandpani nahak said…
शुक्रिया लक्ष्मण जी
At 7:27pm on March 10, 2016, TEJ VEER SINGH said…

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!आपने मुझे इस क़ाबिल समझा!

 
 
 

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