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रवि भसीन 'शाहिद'
  • Male
  • Ferozepur, Punjab
  • India
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रवि भसीन 'शाहिद''s Friends

  • Samar kabeer
  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
  • योगराज प्रभाकर
 

रवि भसीन 'शाहिद''s Page

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Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब, तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें । पहले मतले के दोनों मिसरों में रब्त पैदा नहीं हो सका, देखियेगा । 'चलते ही चलते दूर निकल आये इस क़दर' मैं इस मिसरे को यूँ कहता:- 'हम चलते…"
Monday
अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब, शानदार ग़ज़ल कहने के लिए मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मजदूर अब भी जा रहा पैदल चले यहाँ-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, सादर अभिवादन। देश के मौजूदा हालात और मसअलों पे बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने, इस पर दाद और मुबारकबाद स्वीकार करें। लक्ष्मण भाई, जो अरकान आपने लिखे हैं, ये बह्र मैंने कभी नहीं देखी। इसके क़रीब की मुस्तनद बह्र ये है: मज़ारे मुसम्मन अख़रब…"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post सिर्फ़ सन्नाटा है ता-हद्द-ए-नज़र अब मेरी(१०२ )
"आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' साहिब, इस बेहतरीन ग़ज़ल पर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें।"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी, आपकी ज़र्रा-नवाज़ी के लिए तह-ए-दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ!"
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, आदाब। प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक आभार। जी भाई, हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि शाइरी पे ध्यान लग नहीं रहा था। आशा है कि अब नियमित रूप से उपस्थित रहूँगा। आपका तह-ए-दिल से शुक्रिय:!"
Monday
डॉ छोटेलाल सिंह commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"यूँ जिंदगी से आँख चुराना बहुत हुआ,कमाल की गज़ल आदरणीय रवि भसीन साहब मंत्रमुग्ध हो गया पढ़कर ,दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई । मंच पर काफी दिनों बाद दिखाई दिये । कहीं ब्यस्त थे क्या ?"
Sunday
रवि भसीन 'शाहिद' posted a blog post

उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)

221 / 2121 / 1221 / 212उस बेवफ़ा से दिल का लगाना बहुत हुआमजबूर दिल से हो ये बहाना बहुत हुआ [1]छोड़ो ये ज़ख़्म-ए-दिल का फ़साना बहुत हुआये आशिक़ी का राग पुराना बहुत हुआ [2]चलते ही चलते दूर निकल आये इस क़दरख़ुद से मिले हुए भी ज़माना बहुत हुआ [3]ख़ुद से भी कोई रोज़ मुलाक़ात कीजियेये दूसरों से मिलना मिलाना बहुत हुआ [4]तस्कीन दे न पाएँगे काग़ज़ पे कुछ निशाँलिख लिख के उसका नाम मिटाना बहुत हुआ [5]अब इक नया बनाइए ख़ुशरंग गुलसिताँग़म के ही ज़र्द फूल खिलाना बहुत हुआ [6]आहट सुनाई देती है अब इंक़लाब कीज़ालिम के आगे सर को…See More
Sunday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post किसी का दिल से जो ख़ुश-आमदीद होता है (१०३ )
"आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' साहिब, आदाब। इस सुंदर ग़ज़ल पर आपको ढेरों बधाई। शायद अरकान ग़लत लिखे गए हैं। दरअस्ल आपकी ग़ज़ल इस बह्र में है:मुज्तस मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़ (महज़ूफ़ मुसक्किन)1212 1122 1212 112 (22)"
Sunday
सूबे सिंह सुजान commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)
"वाह यह तो बहुत खूबसूरत है "
May 3
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Samar kabeer's blog post "ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"
"आदरणीय समर कबीर साहिब, सादर प्रणाम। आपने ओ बी ओ को दसवीं सालगिरह पर बेहद ख़ूबसूरत तुहफ़ा दिया है, और इस मंच से आपकी मुहब्बत अश'आर से स्पष्ट प्रकट हो रही है। आप जितने बा-कमाल शाइर हैं, उतने ही अच्छे उस्ताद भी हैं। आप को सलाम पेश करता हूँ। आदरणीय…"
Apr 3
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)
"आदरणीय योगराज प्रभाकर साहिब, सादर नमन। मेरी इस ग़ज़ल को फ़ीचर ब्लॉग में शामिल करने के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्र गुज़ार हूँ।"
Apr 3
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय साहिबा, आपकी बधाई और प्रोत्साहन के लिए हृदयतल से आपका आभारी हूँ।"
Mar 31
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीय मनन कुमार सिंह जी, आपकी बधाई के लिए हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।"
Mar 31
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीय योगराज प्रभाकर जी, मार्गदर्शन के लिए आपका हृदयतल से आभारी हूँ। दरअस्ल, मेरा ज़हन एक नंबर माँग रहा था, जो आपने दे दिया (300-350)। मैं OBO के मंच पर लघुकथाएँ पढ़ कर अंदाज़े से ही लिखने लगा था, और ये सवाल शुरू से मन में खटकता था। जो आलेख आपने पढ़ने…"
Mar 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Punjab
Native Place
Ferozepur
Profession
Teacher
About me
Passionate about Urdu poetry and music, an English and IELTS trainer by profession, author of a book of short stories 'And That's the Whole Story'

रवि भसीन 'शाहिद''s Blog

उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)

221 / 2121 / 1221 / 212

उस बेवफ़ा से दिल का लगाना बहुत हुआ

मजबूर दिल से हो ये बहाना बहुत हुआ [1]

छोड़ो ये ज़ख़्म-ए-दिल का फ़साना बहुत हुआ

ये आशिक़ी का राग पुराना बहुत हुआ [2]

चलते ही चलते दूर निकल आये इस क़दर

ख़ुद से मिले हुए भी ज़माना बहुत हुआ [3]

ख़ुद से भी कोई रोज़ मुलाक़ात कीजिये

ये दूसरों से मिलना मिलाना बहुत हुआ [4]

तस्कीन दे न पाएँगे काग़ज़ पे कुछ निशाँ

लिख लिख के उसका नाम मिटाना बहुत हुआ [5]

अब इक…

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Posted on May 24, 2020 at 10:32am — 6 Comments

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

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Posted on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन

2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे

राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं

देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब

बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे

सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे…

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Posted on March 20, 2020 at 7:00pm — 15 Comments

जो तेरी आरज़ू (ग़ज़ल)

बहरे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

1 2 2 2 / 1 2 2 2 / 1 2 2

जो तेरी आरज़ू खोने लगा हूँ

जुदा ख़ुद से ही मैं होने लगा हूँ [1]

जो दबती जा रही हैं ख़्वाहिशें अब

सवेरे देर तक सोने लगा हूँ [2]

बड़ी ही अहम हो पिक फ़ेसबुक पर

मैं यूँ तय्यार अब होने लगा हूँ [3]

जो आती थी हँसी रोने पे मुझको

मैं हँसते हँसते अब रोने लगा हूँ [4]

बढ़ाता जा रहा हूँ उनसे क़ुरबत

मैं ग़म के बीज अब बोने लगा हूँ [5]

जो पुरखों की दिफ़ा…

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Posted on March 15, 2020 at 1:00am — 10 Comments

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At 5:13pm on March 1, 2020,
प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर
said…

आपकी ज़र्रानवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया मोहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब. 

 
 
 

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