For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रवि भसीन 'शाहिद''s Blog (23)

एक नया दस्तूर (ग़ज़ल - शाहिद फिरोज़पुरी)

22 / 22 / 22 / 22 / 22 / 22

एक नया दस्तूर चलाया जा सकता है

ग़म को भी महबूब बनाया जा सकता है [1]

अपने आप को यूँ तड़पाया जा सकता है

बीती बातों पर पछताया जा सकता है [2]

यार की बाँहों में अब दम घुटता है मेरा

जन्नत से भी तो उकताया जा सकता है [3]

आशिक़ सा मासूम कहाँ पाओगे जिस से

अपना कह कर सब मनवाया जा सकता है [4]

पहली बार महब्बत छूती है जब दिल को

उस लम्हे को कैसे भुलाया जा सकता है [5]

जीत…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on August 9, 2020 at 12:42pm — 18 Comments

वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

बह्रे मज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

221  /  2121 /  1221  /  212



मुहलत जो ग़म से पाई थी वो भी नहीं रही

इक आस जगमगाई थी वो भी नहीं रही [1]

देकर लहू जिगर का मसर्रत जो मुट्ठी भर

हिस्से में मेरे आई थी वो भी नहीं रही [2]

शाहाना तौर हम कभी अपना नहीं सके

आदत में जो गदाई थी वो भी नहीं रही [3]

दुनिया घिरी है चारों तरफ़ से बुराई में

बंदों में जो भलाई थी वो भी नहीं रही…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on August 2, 2020 at 3:25pm — 12 Comments

मक़ाम ऐसे चाहत में आने लगे हैं (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

122 / 122 / 122 / 122

मक़ाम ऐसे चाहत में आने लगे हैं

अब उनके सितम दिल को भाने लगे हैं [1]

मज़े वस्ल में पहले आते थे जो सब

हमें अब वो फ़ुर्क़त में आने लगे हैं [2]

उन्हीं का तो ग़म हमने ग़ज़लों में ढाला

ये एहसाँ वो हम पर जताने लगे हैं [3]

नया जौर का सोचते हैं तरीक़ा

वो उँगली से ज़ुल्फ़ें घुमाने लगे हैं [4]

मुझे लोग दीवाना समझेंगे शायद

मेरे ख़त वो सबको सुनाने लगे हैं [5]

हुए इतने बेज़ार ज़ुल्मत से…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 27, 2020 at 9:59am — 14 Comments

क्या बताएँ तुम्हें किस बात पे रोना आया (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

2122 / 1122 / 1122 / 22

उस अधूरी सी मुलाक़ात पे रोना आया

जो न कह पाए हर उस बात पे रोना आया [1]

दूरियों के थे जो क़ुर्बत के भी हो सकते थे

ऐसे खोए हुए लम्हात पे रोना आया [2]

दे गए जाते हुए वो जो ख़ज़ाना ग़म का

जाने क्यूँ उस हसीं सौग़ात पे रोना आया [3]

रो लिए उनके जवाबात पे हम जी भर के

फिर हमें अपने सवालात पे रोना आया [4]

आँख भर आई अचानक यूँ ही बैठे बैठे

क्या बताएँ तुम्हें किस बात पे रोना आया [5]

दिल तो…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 26, 2020 at 4:46pm — 11 Comments

महब्बतों में मज़ा भी नहीं रहा अब तो (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

बह्रे मुजतस मुसम्मन मख्बून महज़ूफ मक़्तूअ'

1212 / 1122 / 1212 / 22

क़रार-ए-मेहर-ओ-वफ़ा भी नहीं रहा अब तो

महब्बतों में मज़ा भी नहीं रहा अब तो [1]

जहाँ से मुझको गिला भी नहीं रहा अब तो

मलाल इसके सिवा भी नहीं रहा अब तो [2]

ख़बर जहान की तुम पूछते हो क्या यारो

मुझे कुछ अपना पता भी नहीं रहा अब तो [3]

जिसे सँभाल के रक्खा था इक निशानी सा

मेरा वो ज़ख़्म हरा भी नहीं रहा अब तो [4]

है बेवफ़ाई में उसकी ग़ज़ब की…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 13, 2020 at 12:00am — 8 Comments

किसे आवाज़ दूँ (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

बह्रे रमल मुसम्मन महज़ूफ़

2122  / 2122  /  2122  /  212

जिस तरफ़ देखूँ है तन्हाई किसे आवाज़ दूँ

हर मसर्रत दिल की गहनाई किसे आवाज़ दूँ

ना-उमीदी दिल पे है छाई किसे आवाज़ दूँ

दौर-ए-ग़म से रूह घबराई किसे आवाज़ दूँ

बंद है हर दर यहाँ तो हर गली वीरान है

ज़िन्दगी मुझको कहाँ लाई किसे आवाज़ दूँ

कोई भी ऐसा नहीं जो दर्द-ओ-ग़म समझे मेरा

हर तरफ़…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 8, 2020 at 2:01pm — 7 Comments

चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

212  /  1222  /  212  /  1222

दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं पर

एक मुल्क ऐसा है जो बला का है ख़ुद-सर

लाल जिसका परचम है इंक़लाब नारा है

ज़ुल्म करने में जिसने सबको जा पछाड़ा है

इस जहान का मरकज़ ख़ुद को गो समझता है

राब्ता कोई दुनिया से नहीं वो रखता है

अपनी सरहदों को वो मुल्क चाहे फैलाना

इसलिए वो हमसायों से है आज बेगाना

बात अम्न की करके मारे पीठ में खंजर

और रहनुमा उसके झूट ही बकें दिन भर

इंसाँ की तरक़्क़ी…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 3, 2020 at 1:00am — 10 Comments

ग़ज़ल (वही मंज़र है और मैं) - शाहिद फ़िरोज़पुरी

बहरे मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

221  / 2121  / 1221 /  212

बद-हालियों का फिर वही मंज़र है और मैं

इक आज़माइशों का समंदर है और मैं [1]

अरमान दिल के दिल में घुटे जा रहे हैं सब

महरूमियों का एक बवंडर है और मैं…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on June 16, 2020 at 11:54am — 17 Comments

ये जो कुछ ख़्वाब पाल बैठे हैं (ग़ज़ल)

ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू'अ

2122 / 1212 / 22

ये जो कुछ ख़्वाब पाल बैठे हैं

जान आफ़त में डाल बैठे हैं [1]

दिल से हम को निकाल बैठे हैं

देखिए पुर-मलाल बैठे हैं [2]

कह चुके हैं हमें वो जाने को

फिर भी देखो मजाल बैठे हैं [3]

बढ़ गए आगे सब हुनर वाले

हम यहीं बे-कमाल बैठे हैं [4]

अब ज़रूरत नहीं सलाहों की

हम तो सिक्का उछाल बैठे हैं [5]

मेरे और उनके दरमियाँ जाने

कितने ही माह-ओ-साल बैठे हैं…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on June 8, 2020 at 12:30pm — 13 Comments

उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)

221 / 2121 / 1221 / 212

उस बेवफ़ा से दिल का लगाना बहुत हुआ

मजबूर दिल से हो ये बहाना बहुत हुआ [1]

छोड़ो ये ज़ख़्म-ए-दिल का फ़साना बहुत हुआ

ये आशिक़ी का राग पुराना बहुत हुआ [2]

चलते ही चलते दूर निकल आये इस क़दर

ख़ुद से मिले हुए भी ज़माना बहुत हुआ [3]

ख़ुद से भी कोई रोज़ मुलाक़ात कीजिये

ये दूसरों से मिलना मिलाना बहुत हुआ [4]

तस्कीन दे न पाएँगे काग़ज़ पे कुछ निशाँ

लिख लिख के उसका नाम मिटाना बहुत हुआ [5]

अब इक…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on May 24, 2020 at 10:32am — 8 Comments

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन

2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे

राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं

देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब

बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे

सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 20, 2020 at 7:00pm — 16 Comments

जो तेरी आरज़ू (ग़ज़ल)

बहरे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

1 2 2 2 / 1 2 2 2 / 1 2 2

जो तेरी आरज़ू खोने लगा हूँ

जुदा ख़ुद से ही मैं होने लगा हूँ [1]

जो दबती जा रही हैं ख़्वाहिशें अब

सवेरे देर तक सोने लगा हूँ [2]

बड़ी ही अहम हो पिक फ़ेसबुक पर

मैं यूँ तय्यार अब होने लगा हूँ [3]

जो आती थी हँसी रोने पे मुझको

मैं हँसते हँसते अब रोने लगा हूँ [4]

बढ़ाता जा रहा हूँ उनसे क़ुरबत

मैं ग़म के बीज अब बोने लगा हूँ [5]

जो पुरखों की दिफ़ा…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 15, 2020 at 1:00am — 11 Comments

करेगा तू क्या मिरी वकालत (ग़ज़ल)

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ अस्लम

121   22   121   22

फ़रेब-ओ-धोका है ये अदालत

करेगा तू क्या मिरी वकालत [1]

रसूल कितने ही आ चुके पर

गई न इंसान की जहालत [2]

सनम रिझाएँ ख़ुदा मनाएँ

है गू-मगू की ये अपनी हालत [3]

जो मुड़ गया राह-ए-इश्क़ से तो

रहेगी ता-उम्र फिर ख़जालत [4]

किसे फ़राग़त जो दे तवज्जो

दिखाइएगा किसे बसालत [5]

है मुख़्तसर मेरी गुफ़्तगू पर

है ग़ौर और फ़िक्र में तवालत…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 10, 2020 at 5:30pm — 5 Comments

होली के इन रंगों में (ग़ज़ल)

बह्र मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ 16-रुक्नी

(बह्र-ए-मीर)

2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2 2   2

छुपे हैं जाने कितने क़िस्से होली के इन रंगों में

प्यार मुहब्बत यारी रिश्ते होली के इन रंगों में

बच्चों की अठखेली इनमें और दुआएँ पुरखों की

जवाँ दिलों के ख़्वाब मचलते होली के इन रंगों में

नीला सब्ज़ गुलाबी पीला लाल फ़िरोज़ी नारंगी

जीवन के सब रंग झलकते होली के इन रंगों में

सदा मनाते आए होली मिल कर सब हिंदुस्तानी…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 10, 2020 at 12:00am — 4 Comments

कोई हो ही नहीं सकता (ग़ज़ल)

बह्र हज़ज मुसम्मन सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222

सियासत में शरीफ़ इन्साँ कोई हो ही नहीं सकता

सियासतदान सा शैताँ कोई हो ही नहीं सकता

जो नफ़रत की दुकानों में है शफ़क़त ढूँढता फिरता

उस इन्साँ से बड़ा नादाँ कोई हो ही नहीं सकता

निकाला जा रहा है जो जनाज़ा ये सदाक़त का

तबाही का सिवा सामाँ कोई हो ही नहीं सकता

बिरादर को बिरादर से रफ़ाक़त अब नहीं बाक़ी

ये नुक़साँ से बड़ा नुक़साँ कोई हो ही नहीं…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 29, 2020 at 10:30pm — 6 Comments

माइल नहीं हुआ (ग़ज़ल)

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

ये दिल इबादतों पे तो माइल नहीं हुआ

मुनकिर न था मगर कभी क़ाइल नहीं हुआ

इसको बचा बचा के यूँ कब तक रखेंगे आप

वो दिल ही क्या जो इश्क़ में घाइल नहीं हुआ

ग़ैरत थी कुछ अना थी किया ज़ब्त उम्र भर

मैं तिश्नगी में जाम का साइल नहीं हुआ

दर्जा अदब का ऊँचा है मज़हब से जान लो

शाइर कभी भी वज्ह-ए-मसाइल नहीं हुआ

क्या क्या…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 27, 2020 at 11:12pm — 6 Comments

जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

.

तेरे फ़रेब-ओ-मक्र सभी जानता हूँ मैं

'शाहिद' हूँ ज़िन्दगी तुझे पहचानता हूँ मैं

काफ़िर न जानिए है ये कुछ अस्र-ए-बद-दुआ

शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ मैं

जी भर के ज़िन्दगी न जिया ख़ुद से है गिला

जीने की रोज़ सुब्ह यूँ तो ठानता हूँ मैं

इक़बाल-ए-जुर्म मेरा मुसव्विर भी तो करे

ख़ुद की तो ख़ामियाँ सभी गर्दानता हूँ…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 25, 2020 at 1:00am — 5 Comments

तू ही नहीं मैं भी तो हूँ (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2

सारी दुनिया से ख़फ़ा तू ही नहीं मैं भी तो हूँ

हादसों का सिलसिला तू ही नहीं मैं भी तो हूँ

दौड़ता जाता है ख़ामोशी से बिन पूछे सुने

वक़्त से दहशत-ज़दा तू ही नहीं मैं भी तो हूँ

ज़िन्दगी है लम्हा लम्हा जंग अपने-आप से

अपने अंदर कर्बला तू ही नहीं मैं भी तो हूँ

दिल के अंदर गूंजती हैं चीख़ती ख़ामोशियाँ

एक साज़-ए-बे-सदा तू ही नहीं मैं भी…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 20, 2020 at 12:44am — 7 Comments

ये कैसी बहार है (ग़ज़ल)

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

फूलों के सीने चाक हैं बुलबुल फ़रार है

सब दाग़ जल उठे हैं ये कैसी बहार है

कैसी बहार शहर में क्या मौसम-ए-ख़िज़ाँ

कारें इमारतें हैं दिलों में ग़ुबार है

कुछ बस नहीं बशर का क़ज़ा पर हयात पर

लेकिन ग़ुरूर ये है कि ख़ुद-इख़्तियार है

हाकिम है ख़ूब ख़्वाब-फ़रोशों पे मेहरबां

भाता नहीं उसे जो हक़ीक़त-निगार है

क्या ख़ूब है…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 16, 2020 at 7:41pm — 4 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Chetan Prakash commented on सालिक गणवीर's blog post मंज़िल की जुस्तजू में तो घर से निकल पड़े..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आदाब,  सालिक गणवीर साहब,  छोटी  सी किन्तु  खूबसूरत ग़ज़ल  कही आपने,…"
33 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 123 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक स्वागत है, सुधीजनो !"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . .
"वाह .. आपकी छांदसिक यात्रा के प्रति साधुवाद  शुभातिशुभ"
10 hours ago
Md. Anis arman posted a blog post

ग़ज़ल

12122, 121221)वो मिलने आता मगर बिज़ी थामैं मिलने जाता मगर बिज़ी था2)था इश्क़ तुझसे मुझे भी यारा तुझे…See More
13 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
13 hours ago
सालिक गणवीर posted blog posts
13 hours ago
Md. Anis arman commented on Md. Anis arman's blog post ग़ज़ल
"जनाब लक्ष्मण धामी साहब ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
14 hours ago
Md. Anis arman commented on Md. Anis arman's blog post ग़ज़ल
"जनाब समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने और अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
14 hours ago
सालिक गणवीर commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-दिल दिया हमने
"आदरणीया रचना जी सादर अभिवादन एक उम्दः ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें"
20 hours ago
TEJ VEER SINGH posted a blog post

आत्म घाती लोग - लघुकथा -

आत्म घाती लोग - लघुकथा - मेरे मोबाइल की  घंटी बजी। स्क्रीन पर दीन दयाल का नाम था। मगर दीन दयाल का…See More
21 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-दिल दिया हमने
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी हौसला बढ़ाने के लिए आभार। आदरणीय बहुत ध्यान रखती हूँ फिर भी नुक़्ते कहीं न…"
21 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-दिल दिया हमने
"आदरणीय समर कबीर सर् आदाब।सर् हौसला बढ़ाने के लिए बेहद शुक्रिय:।सर् फेयर में आपके कहे अनुसार सुधार…"
21 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service