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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-जल उठा
"उचित है आदरणीय समर कबीर जी...रोजमर्रा बोले जाने वाले बहुत शब्द हैं जो हम गलत उच्चारण करते हैं...इसलिए ये कमियां रह जाती हैं। लेकिन ओबीओ पे आप हैं बताने के लिए...उसके लिए आपका धन्यवाद...लेकिन अगर 'हद्द' 21 भी लें तो 'एक हद्द' को…"
Apr 27
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-जल उठा
"जनाब बृजेश कुमार जी आदाब , ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें I  'वहशियों ने  वहशतों की तोड़  दी हर एक  हद' आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि इस मिसरे में सहीह शब्द "हद्द" 21 है ,देखिएगा I "
Apr 26
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल-जल उठा

2122       2122       2122       212नफ़रतों की  आग भड़की भाईचारा  जल उठाख़ौफ़ इतना है कि दरिया का किनारा जल उठाभीड़  ने  पकड़ा  किसी  को, देखते  ही  देखतेअम्न की उम्मीद उल्फ़त का सितारा जल उठा वहशियों ने  वहशतों की तोड़  दी हर एक  हदफिर कोई अरमान,आँखों का सहारा जल उठाआह ये  नफ़रत  नगर  से  गाँव  कैसे आ  गईखेत झुलसे हैं  कहीं खलिहान सारा जल उठाआज  फिर से रात  काली आ गई  फुफकारतीआज फिर 'ब्रज' ने पुराना ग़म सँवारा जल उठा(मौलिक एवं अप्रकाशित)बृजेश कुमार 'ब्रज'See More
Apr 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post सार छंद - अनुभूति
"सार छंद में बढ़िया रचना है आदरणीय..."
Apr 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on AMAN SINHA's blog post मैं थक गया हूँ
"अच्छे भाव हैं भाई लेकिन ऊपर से दूसरी पंक्ति में पत्थर और शैल में अंतर होता है क्या?"
Apr 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ओबीओ को एक छोटी सी भेंट---ग़ज़ल
"भई वाह क्या ही खूब कहा आदरणीय..."
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post गिरगिटी रंगबाज़ी की आदत तेरी----- ग़ज़ल
"बहुत खूब कहा आदरणीय मिश्रा जी...हार्दिक बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post ओ बी ओ मंच को 12वीं सालगिरह पर समर्पित ग़ज़ल
"बढ़िया बहुत बढ़िया कहा आदरणीय... बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Samar kabeer's blog post ओबीओ की बारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा
"बहुत ही शानदार ढंग से मंच को बधाई समर्पित की है आदरणीय... बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post रोला छंद .....
"सुंदर रचना आदरणीय सुशील जी...लेकिन "दो अधरों की पास या दो अधरों के पास" हार्दिक बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on मिथिलेश वामनकर's blog post पंख था कतरा हुआ : ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)
"बड़ी ही उम्दा ग़ज़ल कही आदरणीय मिथिलेस जी...हार्दिक बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on amita tiwari's blog post युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं
"बहुत ही खूब कविता है...बधाई"
Apr 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post सलाह. . . . लघुकथा
"बहुत ही मर्मस्पर्शी लघुकथा है आदरणीय..बधाई"
Feb 12
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहा सप्तक -७( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )
"सुंदर बहुत सुंदर दोहे आदरणीय..."
Feb 12
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on मनोज अहसास's blog post अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास
"उम्दा ग़ज़ल कही भाई मनोज जी...बधाई"
Feb 12
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post नज़्म - शहीद की आरज़ू
"वाह सुंदर देशभक्ति से परिपूर्ण ..."
Feb 12

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Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल-जल उठा

2122       2122       2122       212

नफ़रतों की  आग भड़की भाईचारा  जल उठा

ख़ौफ़ इतना है कि दरिया का किनारा जल उठा



भीड़  ने  पकड़ा  किसी  को, देखते  ही  देखते

अम्न की उम्मीद उल्फ़त का सितारा जल उठा
 

वहशियों ने  वहशतों की तोड़  दी हर एक  हद

फिर कोई अरमान,आँखों का सहारा जल उठा


आह ये  नफ़रत  नगर  से  गाँव  कैसे आ  गई

खेत झुलसे हैं  कहीं खलिहान सारा जल…
Continue

Posted on April 22, 2022 at 8:24pm — 2 Comments

ग़ज़ल-दुख

1222      1222      1222       122

किसी की बेरुख़ी है या सनम हालात  का दुख

परेशां  हूँ हुआ  है अब तुझे किस बात का दुख



तुम्हें  तो  पड़  गई  हैं  आदतें  सी  रतजगों  की

तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता बढ़ रहा जो रात का दुख



जमाती  सर्दियाँ, फुटपाथ  का  घर, पेट  ख़ाली

उन्हें  सोने  नहीं  देता  कई  हालात  का  दुख



भिंगोते  रात  का आँचल  बशर अपने  ग़मों से…

Continue

Posted on December 30, 2021 at 11:00am — 5 Comments

ग़ज़ल- एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

2122 1212 22

बस यही इक फ़रेब खा बैठा
मैं उसे  ज़िन्दगी  बना  बैठा

एक  पत्थर है  ज़िन्दगी  मेरी
उसी पत्थर से दिल लगा बैठा

धूप  अपने  शबाब  पर आई
और साया भी  दूर जा  बैठा

ख़त्म  कैसे  भला  अँधेरा  हो
एक दीपक था जो बुझा बैठा

फिर ग़ज़ल रो पड़ी सरे महफ़िल
गीत फिर ग़म भरा सुना बैठा

'ब्रज' लिए है उदासियाँ अपनी
सामने  चाँद  अनमना  बैठा

(मैलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on December 18, 2021 at 12:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

1222 1222 1222 1222

जरा सा मसअला है ये नहीं  तकरार के  क़ाबिल

किनारा हो नहीं सकता कभी मझधार के क़ाबिल

न ये संसार  है मेरे  किसी भी  काम का  हमदम

नहीं हूँ मैं किसी  भी तौर से  संसार के  क़ाबिल

न मेरी  पीर है  ऐसी  जिसे  दिल  में रखे  कोई

न मेरी  भावनायें हैं  किसी  आभार के  क़ाबिल

ये मुमकिन है ज़माने में हंसी तुझसे ज़ियादा हों

सिवा तेरे  नहीं कोई  मेरे  अश'आर के  क़ाबिल

मेरे आँसू तुम्हारी आँखों से बहते तो अच्छा…

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Posted on November 25, 2021 at 12:00pm — 14 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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