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नाथ सोनांचली
  • Male
  • वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  • India
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"आपका बहुत बहुत आभार"
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"आद0 अमित जी सादर अभिवादन। बहुत बहुत शुक्रिया आपका"
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"आद0 अमित जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति का बहुत बहुत आभार"
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"आद0 नादिर खान जी सादर अभिवादन। आपका शुक्रिया"
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"आद0 राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन। बहुत बहुत आभार आपका"
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"आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। आपकी कृपा से कुछ कह पाता हूँ। हृदयतल से आभार आपका। स्नेह बनाये रखें"
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"आद0 रूपम कुमार जी सादर प्रणाम। ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और बधाई का शुक्रिया"
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"आद0 ऋचा यादव जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल का प्रयास है। बधाई स्वीकार कीजिये"
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"आद0 रवि शुक्ल जी सादर प्रणाम। हर एक शैर बहुत ही खूबसूरत है। पढ़कर वाह ख़ुद ब खुद निकल रहा है। बधाई स्वीकार कीजिये"
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Varanasi
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About me
I am a simple leaving man, having hobby to write poems

नाथ सोनांचली's Blog

ग़ज़ल (तेरे खाने के लिए मुफ्त का माल अच्छा है)

अरकान- 2122  1122   1122   112/22

तेरे  खाने  के  लिये  मुफ्त  का माल  अच्छा है

इसलिये  लगता  चुनावों का  वबाल  अच्छा है

ये  अलग  बात  कि  सूरत  न  भली  हो  लेकिन

कुछ न कुछ हर कोई करता ही कमाल अच्छा है

हम  जवाबों  से  परखते  हैं  रज़ामन्दी  को

मुस्कुरा दे वो अगर समझो सवाल अच्छा है

हद से बाहर तो हर  इक  चीज़  बुरी  लगती है

हद में रह कर जो किया जाए धमाल अच्छा है

अस्मतें रोज़ ही माँ बहनों की बिकती हैं…

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Posted on January 5, 2021 at 12:57pm — 5 Comments

गीत -नवीन वर्ष में नवीन गीत रंग रास हो (पञ्चचामर छ्न्द)

विचार में प्रवाह हो स्वभाव में उजास हो

नवीन वर्ष  में  नवीन  गीत  रंग  रास  हो

प्रभात धूप हो खिली समीर मस्त हो बहे

अनन्त हर्ष को लिए सुवास भाव भी रहे

कपाट  बंद खोल के धरे नवीन ज्ञान को

समर्थ अर्थ में  रखे सदैव स्वाभिमान को

रहे  कहीं  न दीनता सदा  यही प्रयास हो

नवीन वर्ष में नवीन गीत रंग रास हो।।१

विकार काम क्रोध मोह लोभ क्षोभ त्याग दे

कुमार्ग  पे  चले नहीं  विनाश  का न राग दें

कहीं  दिखे  अधर्म  तो  अधर्म  देह  चीर दें

समाज …

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Posted on December 30, 2020 at 2:54pm — 11 Comments

आज़ादी के पुनीत पर्व पर वीर रस की कविता

आज पुनः जब मना रहे हम, वर्षगाँठ आज़ादी की

आओ थोड़ी चर्चा करलें, जनगण मन आबादी की

जिन पर कविता गीत लिखूँ तो, झर-झर आँसू आते हैं

रोम-रोम में सिहरन होती, भाव सभी मर जाते हैं।।1

ऐसे भी हैं यहाँ कई जो, घर को सर पर ढोते हैं

घोर अँधेरा फुटपाथों पर, बिना बिछौना सोते हैं

गर्मी में तन झुलसे उनका, सर्दी हाड़ कँपाती है

तब जश्ने आज़ादी अपनी, उनको ख़ूब चिढ़ाती है।।2

भूखा प्यासा उलझा बचपन, भटक रहा अँधियारों में

फूटी क़िस्मत खोज रहा वह, कूड़े के गलियारों…

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Posted on August 15, 2020 at 12:07pm — 8 Comments

गजल- कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक

बह्र- 2122   1122   1122  112/22

कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक

ज़िन्दगी में सकूँ मिलता नहीं मर जाने तक

मुफ़लिसी नेक दिली और ज़माने का दर्द

ये सभी सिर्फ़ सियासत में उतर जाने तक

शादी लड्डू ही नहीं एक बला है इसका

होता अहसास नहीं पंख कतर जाने तक

यार बरसात किसे अच्छी नहीं लगती मगर

खेत खलियान नदी ताल के भर जाने तक

हर तरफ़ शह्र में ख़ूँख़ार दरिन्दे घूमें

बेटियाँ ख़ौफ़ज़दा लौट के घर जाने…

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Posted on August 4, 2020 at 6:11am — 10 Comments

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At 7:03pm on April 11, 2019, Vivek Pandey Dwij said…
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी आभार आप को इस उत्साह वर्धन के लिए।
At 7:39pm on November 20, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी ग़ज़ल "हाथ से सारे फिसल गए" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

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आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
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"आ. प्रतिभा बहन , सादर अभिवादन । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई । "
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