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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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"वाह वाह आदरणीय..बेहतरीन ग़ज़ल"
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"बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..."
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"वाह बहुत सुन्दर रचना आदरणीय..."
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल(डर लग रहा है तेवरे दिलदार देख कर )
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on vijay nikore's blog post तब्दीले आबोहवा
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- ख़ुद को क़िस्सा-गो समझे है हर क़िरदार कहानी में
"वाकई बड़ी ही अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर"
Apr 13

Profile Information

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Male
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noida
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jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल...परेशां रहा हूँ मैं अहल-ए-सितम से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

122 122 122 122

गम-ए-दिल उठाऊँ,अज़ीमत नहीं है

मगर बच निकलने की सूरत नहीं है

सुनो बख़्श दो मुझको वादों वफ़ा से

यहाँ अब किसी की जरुरत नहीं है

परेशां रहा हूँ मैं अहल-ए-सितम से

तुम्हारी भी क़ुर्बत की नीयत नहीं है

ओ महताब तू है तो ग़ज़लें हैं रौशन

वगरना सुख़नवर की अज़्मत नहीं है

सरेआम  'ब्रज' की ग़ज़ल गुनगुनाना

ये है और क्या गर मुहब्बत नहीं है

अज़ीमत-इरादा

अहल-ए-सितम-तानाशाह…

Continue

Posted on April 8, 2018 at 1:30pm — 20 Comments

ग़ज़ल...कभी तो दिल को करार आये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

121 22 121 22 121 22 121 22

कभी जरा सा मैं मुस्कुरा लूँ कभी तो दिल को करार आये

कभी तो भूले से इस चमन में उतर के फ़स्ल-ए-बहार आये

कि इससे पहले ये साँस टूटे सफ़ीना डूबे ये ज़िन्दगी का

चले भी आओ सनम कहीं से कहाँ कहाँ हम पुकार आये

बड़ी अदा से नजर झुकाये वो पूछते हैं कहाँ थे अब तक

सुनाये कैसे वो आपबीती वो ज़िन्दगी जो गुजार आये

हजार लम्हे हजार बातें जिन्हें तड़पता ही छोड़ आया

वो शाम वो गेसुओं के साये वो याद फिर बेशुमार…

Continue

Posted on March 26, 2018 at 10:00am — 24 Comments

विश्व कविता दिवस पर एक कविता मंच को समर्पित

विश्व कविता दिवस पर महाभारत युद्धकाल में भगवान के वचनों को अपने शब्दों में पिरोने की कोशिश

​​रे रे पार्थ ये क्या करते हो?

धनु धरा पर क्यों धरते हो?

ओ शूरवीर मत हो अधीर

नैनों में क्यों भरते हो नीर

जीवन तो आना जाना है

चिरकाल किसे रह जाना है

मन में यूँ न मोह धरो

गांडीव उठाओ कर्म करो

मृत्यु बंन्धन से मुक्ति है

किस बात की आसक्ति है

धर्म विमुख हो पाप न कर

रक्षा कर संताप न कर

हे धनंजय हे महारथी

मत भूलो 'मैं' तेरा…

Continue

Posted on March 21, 2018 at 4:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल...तू खुश्बू है चन्दन है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

22 22 22 2
खन खन करता कंगन है
साँसों में भी कम्पन है

मैं पत्थर हूँ राहों का
तू खुश्बू है चन्दन है

आहट है किन कदमों की
उर में कैसा स्पंदन है

आँखों ने क्या कह डाला
आकुल ये मन वंदन है

मन मन्दिर में आ जाओ
स्वागत है अभिनन्दन है
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on March 17, 2018 at 8:30am — 20 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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