२२१/२१२१/१२२१/२१२
***
पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की
साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।
*
कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी
होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।
*
कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का
पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।
*
रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी
साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।
*
माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े
टेढ़ी करो न रोष में रेखा को भाल की।५।
*
होली में अब न शेष हैं रंगो-गुलाल वो
कर दी सभी ने आज ये रंजो मलाल की।६।
*
मजहब की बात छोड़ के खेलोगे रंग जो
लगने लगेगी आप को होली कमाल की।७।
*
रंगों ने साथ देह के मन भी रँगा है आज
होली रहेगी याद 'मुसाफिर' इस साल की।८।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
*
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |
You need to be a member of Open Books Online to add comments!
Join Open Books Online